Slock 1
अध्याय 17 • श्लोक 1 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

अर्जुन उवाच ।
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥१७-१॥

भावार्थ: अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण, जो लोग श्रद्धा से अराधना करते हैं किंतु वेदों के नियमों का पालन नहीं करते, उनका क्या स्थान है? इस तरह की उपासना को किस प्राकृतिक गुण में समझा जाता है - सत्त्वगुण में, रजोगुण में या तमोगुण में?

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 2
अध्याय 17 • श्लोक 2 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

श्रीभगवानुवाच ।
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥१७-२॥

भावार्थ: भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर में कहा - देहधारी जीवात्माओं की श्रद्धा तीन प्रकार की होती है - सात्त्विक, राजसी, और तामसी। पिछले जन्मों से प्राप्त हुए संस्कारों के अनुसार जीवात्मा में उस प्रकार की श्रद्धा प्रकाशित होती है। इस विषय पर और सुनो।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 3
अध्याय 17 • श्लोक 3 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥१७-३॥

भावार्थ: हे भारत, अपनी प्रज्ञा के अनुसार, प्रत्येक जीवात्मा एक विशिष्ट प्रकार की श्रद्धा को विकसित करती है। वास्तव में, व्यक्ति की श्रद्धा ही उसकी पहचान है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 3
अध्याय 17 • श्लोक 3 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

॥ अनुवृत्ति ॥

भावार्थ: इस अध्याय में श्री कृष्ण अर्जुन के उस प्रश्न का उत्तर देते हैं जो ऐसे लोगों के बारे में है जो वेदों के नियमों का पालन नहीं करते, किंतु श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं। अर्जुन जानना चाहता है कि ये लोग किस प्राकृतिक गुण से नियंत्रित हैं। यहाँ पर पहली शिक्षा यह दी जाती है कि यदि कोई वैदिक नियमों का अनुसरण नहीं करता तो वास्तव में वह केवल अपनी इच्छा के अनुसार आचरण करता है, हालांकि ऐसा करने से वह भौतिक गुणों (सत्त्वगुण, रजोगुण, और तमोगुण) के अधीन हो जाता है। अतः वह कभी भी पारलौकिक स्तर पर स्थित नहीं माना जाता है। तत्पश्चात श्री कृष्ण आहार, यज्ञ, तपस्या, एवं दान का वर्णन करते हुए बताते हैं कि कैसे ये प्रकृती के तीन गुणों से प्रभावित होते हैं या उनसे जन्म लेते हैं। सबसे पहले श्रद्धा पर चर्चा की जाती है। श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि व्यक्ति के वर्तमान जीवन में उसके स्वभाव और उसके मन से जुड़े पिछले जन्म के संस्कार के कारण श्रद्धा उत्पन्न होती है। जीवन की सभी गतिविधियां लगभग श्रद्धा पर ही निर्भर होते हैं। एक आस्तिक की श्रद्धा कहती है कि भगवान हैं, और एक नास्तिक की श्रद्धा कहती है की भगवान नहीं हैं। यदि कोई किसी सिद्धान्त का प्रस्ताव करे और फिर यह कह दे कि उसे अपने प्रस्ताव पर ‘श्रद्धा’ नहीं है, तो यह केवल कपट कहलाता है। श्री कृष्ण कहते हैं कि जब किसी की श्रद्धा सत्त्वगुण में होती है, तब वे देवी-देवताओं, जैसे कि गणेश, शिव, सूर्य, इन्द्र, सरस्वति इत्यादि की पूजा करते हैं। जब किसी की श्रद्धा तमोगुण में होती है, तब वे निसर्गे के सत्व की या पूर्वजों की पूजा करते हैं - इस वर्ग के लोगों में मानवतावादी एवं अनीश्वरवादी भी सम्मिलित हैं। जब किसी की श्रद्धा तमोगुण में होती है, वे भूत-प्रेत की पूजा करते हैं। पूजा के ये सभी प्रकार आज के संसार में प्रचलित हैं। भारत में, बहुत लोग बड़े बड़े मन्दिर बनाकर एवं यज्ञ सके माध्यम से देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। सुदूर-पूर्वी देशों में, पूर्वजों की पूजा बुद्ध धर्म, शिनो धर्म, और ताओ धर्म के अनुयायियों में अत्यंत ही लोकप्रिय है। इसी प्रकार, यूरोप एवं अमेरिका में, वैज्ञानिकों, राजनेताओं, सैनिकों, फिल्मी सितारों, रोक सितारों आदि जैसेलोगों को सम्मानित करने के लिए बड़े बड़े इमारत खड़े किए जाते हैं। अफ्रीका, तिब्बत, मेक्सिको, और दक्षिण-अमेरिका में, भूत-पिशाच की पूजा लोकप्रिय है। ये सभी पूजाएं भौतिक त्रिगुणों के प्रभाव से ही किए जाते हैं। अतएव, निष्कर्ष यह निकलता है कि वेदों के नियमों की उपेक्षा करने के कारण, देवी-देवताओं, पूर्वजों, प्रसिद्ध व्यक्तित्वों, भूत-प्रेतों इत्यादि की पूजा पारलौकिक स्तर पर नहीं हैं। भौतिक त्रिगुणों से परे होने का तात्पर्य है वेदों को स्वीकार करना और इस प्रकार विशुद्ध-सत्त्व के पारलौकिक स्तर पर स्थित होना। जब किसी की श्रद्धा विशुद्ध-सत्त्व में स्थित होती है, तब वह श्री कृष्ण की पूजा करता है। यही एक-ईश्वरवाद (यह मानना की केवल एक ही परम भगवान हैं) का सर्वोच्च स्तर है। विशुद्ध-सत्त्व का शिव जी ने इस प्रकार वर्णन किया है - सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव शब्दितम् । यदीयते तत्र पुमानपावृतः ॥ सत्त्वे च तस्मिन् भगवान वासुदेवो । ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते ॥ श्री कृष्ण की आराधना विशुद्ध-सत्त्व में स्थित होकर किया जाना चाहिए। विशुद्ध-सत्त्व ऐसी शुद्ध-चेतना का स्तर है जिसमें ‘वासुदेव’ के नाम से विदित परम-सत्य, बिना किसी आच्छादन के व्यक्त होते हैं। (श्रीमद्भागवतम् ४.३.२३) शुद्ध चेतना के स्तर पर व्यक्ति सर्वोच्चे प्रकार की श्रद्धा, ‘निर्गुण-श्रद्धा’ से निर्देशित होता है, जो भौतिक प्रकृति के गुणों से बिल्कुल ही अदूषित होती है। वेदों का अनुसरण और धर्मनिष्ठ साधुओं की संगत करते हुए कई जन्मों के पश्चात व्यक्ति में सुकृति (पुंजित श्रेय) उत्पन्न होता है। सुकृति व्यक्ति को साधु-संग (आत्मबोध युक्त योगियों) की ओर ले जाता है, और इस प्रकार साधुओं के मार्गदर्शन से निर्गुण-श्रद्धा का विकास विभिन्न स्तरों के माध्यम से होता है, और अंततः आत्म-साक्षात्कार के सर्वोच्च स्तर - प्रेम-भक्ति तक पहुंचाता है। निर्गुण-श्रद्धा एक भक्ति-योगी के हृदय में उदय होती है और उसे पारलौकिक अधोक्षज क्षेत्र में परम सत्य को देखने, सुनने, एवं अनुभव करने में सक्षम बनाती है। निर्गुण-श्रद्धा वह है जो श्री कृष्ण की अनुभूति कराती है, उसी तरह जैसे कि एक बिजली की चमक रात के अंधेरे में सावन के बादलों के आकार को व्यक्त करती है। रात के अंधेरे में बादलों को देखा नहीं जा सकता, लेकिन जब बिजली चमकती है, बादलों का आकार दिखाई देता है। उसी तरह, जब निर्गुण-श्रद्धा योगी के हृदय में उदय होती है, तब वे सौन्दर्य के उस अनुपम रूप को देख पाते हैं, जो श्री कृष्ण का स्वयं रूप है। निर्गुण-श्रद्धा से मार्गदर्शन प्राप्त भक्ति-योगी अनुभव करते हैं कि वे श्री कृष्ण के लिए ही बने हैं, कि वे उनसे स्वतंत्र नहीं हैं। गुणातीत परम पुरुष को समझने की प्रक्रिया कुछ ऐसी होती है कि व्यक्ति को लगना चाहिए कि वह पूर्ण रूप से श्री कृष्ण पर निर्भर है। श्री कृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति काम, महत्त्वाकांक्षा, सत्ता, दंभ एवं अहंकार द्वारा प्रभावित होते हैं, प्रायः वे ऐसी घोर तपस्याएं करते हैं जो वेदों में या भक्ति-योग के विधियों में निर्धारित नहीं होती हैं - ऐसी तपस्याएं शरीर के इन्द्रियों को शुष्क बना देती हैं। इन तपस्याओं में सम्मिलित हैं - दीर्घकालीन उपवास, अपने शरीर पर स्वयं कोड़े मारना, अपने आप को सूली पर चढ़ाना, रोमच्छद बढ़़िए पहनना, शरीर के अंगों को छेदना, तप्त कोयले पर नंगे पैर चलना इत्यादि। चूंकि ये तपस्याएं तमोगुण में किए जाते हैं, ये अंतर्स्थि त परमात्मा की अवहेलना करते हैं, और इसलिए इनसे कोई अच्छा परिणाम प्राप्त नहीं होता। श्री कृष्ण कहते हैं कि ऐसी तपस्या करने वाले असुर हैं।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 4
अध्याय 17 • श्लोक 4 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणान्संश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥१७-४॥

भावार्थ: सात्त्विक लोग देवी-देवताओं की उपासना करते हैं; राजसिक लोग यक्ष-राक्षसों की उपासना करते हैं, और जो तामसिक हैं वे भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 5
अध्याय 17 • श्लोक 5 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥१७-५॥

भावार्थ: अज्ञानी लोग, घमंड एवं अहमभाव के कारण ऐसी कठोर तपस्याएं करते हैं जिनका वेदों में कोई आधार नहीं पाया जाता। काम, महत्त्वाकांक्षा और सत्ता की लालच से प्रेरित होकर वे अपने शरीर को अत्यंत ही पीड़ा पहुंचाते हैं —

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 6
अध्याय 17 • श्लोक 6 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तां विद्धि आसुरनिश्चयान् ॥१७-६॥

भावार्थ: और क्योंकि मैं उनके शरीर के भीतर स्थित हूँ, इस प्रकार से वे मुझेभी पीड़ा पहुंचाते हैं। यह जानो कि ऐसे व्यक्ति आसुरी स्वभाव के होते हैं।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 6
अध्याय 17 • श्लोक 6 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

॥ अनुवृत्ति ॥

भावार्थ:

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 7
अध्याय 17 • श्लोक 7 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥१७-७॥

भावार्थ: लोगों का पसंदीदा आहार और साथ साथ यज्ञ, तप एवं दान की विधियां भी तीन प्रकार की होती हैं। अब इनके बीच में जो अन्तर हैं, उन्हें सुनो।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 8
अध्याय 17 • श्लोक 8 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥१७-८॥

भावार्थ: जो आहार आयु, सत्त्व, बल, स्वास्थ्य, प्रसन्नता एवं तृप्ति को बढ़ाए, जो रसभरा, वसायुक्त, पौष्टिक एवं आकर्षक है, ऐसा आहार सात्त्विक लोगों के लिए अत्यंत ही प्रिय है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 9
अध्याय 17 • श्लोक 9 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

कट्ल्वलवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदारिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥१७-९॥

भावार्थ: जो आहार बहुत कड़वा, खट्टा, नमकीन, मसालेदार, तीखा या बहुत रूखा-सूखा हो, और जो शरीर में जलन पैदा करे, ऐसा आहार दर्द, शोक एवं रोग उत्पन्न करता है। ऐसा आहार राजसिक लोगों के लिए अत्यंत ही प्रिय है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 10
अध्याय 17 • श्लोक 10 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥१७-१०॥

भावार्थ: जो आहार बासी, नीरस, बदबूदार, सड़ा हुआ, दूसरों से फेंका हुआ, और जो यज्ञ में आहुति देने के अयोग्य है, ऐसा आहार तामसिक लोगों के लिए अत्यंत ही प्रिय है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 10
अध्याय 17 • श्लोक 10 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

॥ अनुवृत्ति ॥

भावार्थ: जैसा कि एक फ़्रांसिसी नेता, वक़ील एवं विशेषज्ञ, जौौं ओन्थेल्मा ब्रीयां-सवँरें (Jean Anthelme Brillat-Savarin) ने १९८६ मे लि खा था, "Dismoi ce que tu manges, je te dirai ce que tu es" - मुझे यह बताओ कि आप क्या खाते हो और मैं बताता हूँ कि आप क्या हो”। दुसरे शब्दों में, आप वैसे ही हो जैसा आपका आहार है। किन्तु इस बात को आज के लोगों के मुकाबले प्राचीन समय के लोग बेहतर समझते थे। श्री कृष्ण कह रहे हैं कि आहार को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है, और अपने अपने प्राकृतिक गुणों के अनुसार व्यक्ति को एक प्रकार का आहार अधिक प्रिय होता है। जो आहार आयु बढ़ाए और शक्ति, बल, सेहत, प्रसन्नता, एवं तृप्ति प्रदान करे उस े सत्त्वगुण में माना जाता है। फल, तरकारी, धान्य, चीनी, नमक, मसाले, एवं दूध के उत्पाद सत्त्वगुण में होते हैं। सामान्य तौर पर इन्हें शाकाहारी आहार कहते हैं जो सात्विक लोगों को प्रिय है। जो आहार अत्यंत ही कढ़वा, खट्टा, मीठा, नमकीन, मसालेदार, तीखा या बहुत सूखा हो, जो पेट में अत्यधिक जलन पैदा करे, पीड़ा दे, वाता एवं रोग उत्पन्न करे, ऐसे आहार को रजोगुण में कहा जाता है। सम्भव है कि ऐसा आहार शाकाहारी हो सकता है किंतु इसके बावजूद सामान्य तौर पर ये अत्यधिक नमकीन और मसालेदार होते हैं। शरीर में अधिक मात्रा में नमक एवं मसाले, बलगम उत्पन्न करते हैं जिससे उच्च रक्त चाप, दिल का लक़वा, मधुमेह, एवं कैंसर जैसी बीमारियां पैदा होती हैं। ऐसे आहार से बचे रहना ही अच्छा है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 11
अध्याय 17 • श्लोक 11 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इष्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥१७-११॥

भावार्थ: जो यज्ञ नीजि लाभ की कामना किए बिना स्वार्थ रहित लोगों द्वारा वैदिक विधियों के अनुसार दृढ़ संकल्प से किए जाते हैं, वे यज्ञ सत्त्वगुण में होते हैं।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 12
अध्याय 17 • श्लोक 12 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥१७-१२॥

भावार्थ: परन्तु, हे भरतश्रेष्ठ, जो यज्ञ अभिमान और स्वार्थ से किए जाते हैं उन्हें रजोगुण में समझना चाहिए।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 13
अध्याय 17 • श्लोक 13 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धया रहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥१७-१३॥

भावार्थ: वे यज्ञ जिनमें वैदिक विधियों का पालन नहीं होत, जिनमें अन्नदान नहीं दिया जाता, जिनमें उचित मन्त्रों का उच्चारण नहीं किया जाता, और जिनमें ब्राह्मणों को दान नहीं दिया जाता - ऐसे यज्ञ श्रद्धाहीन होते हैं और इस तरह वे तमोगुण में होते हैं।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 13
अध्याय 17 • श्लोक 13 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

॥ अनुवृत्ति ॥

भावार्थ: आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त करने की इच्छा करने वालों के लिए वेदशास्त्रों में प्रत्येक युगों के लिए एक विशेष यज्ञ का सुझाव दिया गया है। किंतु हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि इनमें से किसी भी यज्ञ में रक्त-बलिदान नहीं होता। पशु एवं मानव बलिदान का प्रचलन प्राचीन समय से दुनिया के अनेक भागों में होता आ रहा है, किंतु इतिहास के किसी भी समय में भक्ति-योग के पथ पर आत्म-साक्षात्कार के साधकों ने कभी भी पशु या मानव बलिदान कभी नहीं किया है। आज के संसार में, कुछ धार्मिक पथों में पशुओं को खाने से पहले उनका बलिदान दिया जाता है और कुछ अन्य पथों में इसी तरह की प्रक्रिया होती है जहां पर एक संत के लहु एवं उनके शरीर का सांकेतिक प्रति रूप का ग्रहण किया जाता है। किन्तु भक्ति-योग की साधना में इस तरह की सभी असभ्य क्रियाएं बिल्कुल ही वर्जित हैं। आधुनिक युग में, वेद-शास्त्र केवल एक प्रकार के यज्ञ का सुझाव देते हैं और वह है श्री कृष्ण-संकीर्तन जिसमें पञ्च-तत्त्व मन्त्र के पश्चात महा-मन्त्र का उच्चारण होता है - जय श्री कृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्या नन्द । जय अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर-भक्त-वृन्द ॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥ महा-मन्त्र के पहले पञ्च-तत्त्व मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए जिस के द्वारा जाने या जाने बगैर किए गए सभी पूर्व अपराधों से साधक को मुक्ति प्राप्त होती है। जब श्री कृष्ण-संकीर्तन की प्रक्रिया श्री कृष्ण महाप्रसाद के वितरण सहित किया जाता है तब इस यज्ञ को सिद्ध एवं संपूर्ण माना जाता है। कलियुग में किसी भी अन्य यज्ञों की आवश्यकता नहीं है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 14
अध्याय 17 • श्लोक 14 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥१७-१४॥

भावार्थ: भगवान, ब्राह्मण, गुरु, एवं प्रज्ञ मनीषियों की पूजा करना, तथा स्वच्छता, निष्कपटता, ब्रह्मचर्य, एवं अहिंसा का पालन करना, समुचित शारीरिक तपस्या है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 15
अध्याय 17 • श्लोक 15 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्गयं तप उच्यते ॥१७-१५॥

भावार्थ: सत्य वचन उस प्रकार व्यक्त करना जिससें कि सुनने वाले उत्तेजित न हों, जो सुनने में सुखद एवं हितकारी हो, और वेद पाठ करना - इन्हें मौखिक तपस्या कहते हैं।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 16
अध्याय 17 • श्लोक 16 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥१७-१६॥

भावार्थ: मन की शांति, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम, एवं हृदय की निर्मलता को मन की तपस्या कहते हैं।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 17
अध्याय 17 • श्लोक 17 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तेः सात्त्विकं परिचक्षते ॥१७-१७॥

भावार्थ: इन तीन तरह की तपस्याओं को जब निष्ठावान, निःस्वार्थ व्यक्ति दृढ़ श्रद्धा के साथ अपनाते हैं, तब उन तपस्याओं को सत्त्वगुण में कहा जाता है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 18
अध्याय 17 • श्लोक 18 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेने चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥१७-१८॥

भावार्थ: प्रतिष्ठा, नाम एवं यश कमाने के लिए अभिमान के साथ किए जाने वाली तपस्याओं को रजोगुण में कहा जाता हैैं। ऐसी तपस्याओं के फल अस्थिर और अशाश्वत होते हैं।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 19
अध्याय 17 • श्लोक 19 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

मूढग्राहणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥१७-१९॥

भावार्थ: मूर्खता से किए जाने वाली तपस्याएं जो न केवल स्वयं को बल्की दूसरों को भी पीड़ा पहुंचाए, ऐसी तपस्याओं को तमोगुण में कहा जाता है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 19
अध्याय 17 • श्लोक 19 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

॥ अनुवृत्ति ॥

भावार्थ: तपस्या का अर्थ है कि कुछ ऐसी साधना करना जिससे कि भौतिक क्रियाशीलता का क्षय हो और परम-सत्य की ओर जागरूकता को बढ़ावा मिले। इन तपस्याओं को १४, १५ एवं १६ वें श्लोकों में बताया गया है। शारीरिक तपस्याएं इस प्रकार हैं - स्वच्छता बनाए रखना, सत्यता, ब्रह्मचर्य, एवं अहिंसा। ब्रह्मचर्य का अर्थ है अवैध यौनक्रिया (विवाह संबंध के बाहर काम-क्रिया) का वर्जन। भगवान की पूजा करना एवं गुरु और अन्य साधुओं का सम्मान करना भी शारीरिक तपस्याएं हैं। जिन तपस्याओं को प्रतिष्ठा, नाम एवं यश कमाने के लिए, घमंड से किया जाता है, ऐसी तपस्याओं का त्याग करना चाहिए। इनमें राजनीतिक, सामाजिक, या आर्थिक लाभ के लिए की जाने वाली तपस्याएं सम्मिलित हैं। मूर्खता से कीए जाने वाली तपस्याएं जो केवल पीड़ा और दुःख देती हैं, उनका भी त्याग किया जाना चाहिए। इस प्रकार इन सभी तपस्याओं का परित्याग होना चाहिए क्योंकि वे राजसिक और तामसिक गुणों में की जाती हैं - अर्थात इनके प्रतिफल अशाश्वत हैं और वे आत्म-साक्षात्कार की ओर नहीं ले जाती हैं। दूसरों को दुःख न पहुंचाते हुए सत्य वचन कहना मौखिक तपस्या कहलाता है। कहते हैं कि, “सत्य दुःखदायक होता है”, किंतु यह बात भगवद्गीता के उपदेशों पर लागू नहीं होता। सत्य को इस प्रकार प्रस्तुत करना चाहिए कि वह सुनने में आकर्षक एवं मनभावन हो। सत्यं ब्रुयात प्रियं ब्रुयात न ब्रुयात सत्यम् अप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रुयाद् एष धर्मः सनातनः ॥ व्यक्ति को केवल सत्य कहना चाहिए, और उसके वचन मीठे होने चाहिए। जो सत्य कष्टदायक हो उसे न कहना ही अच्छा है, किन्तु असत्य कभी नहीं कहना चाहिए भले ही वह सुनने में कितना भी मीठा लगे - यही सनातन धर्म है। (मनु-संहिता ४.१३८) श्री कृष्ण सभी जीवों के मित्र एवं शुभचिंतक हैं और उनके उपदेशों को इस बात को ध्यान में रखकर ही प्रस्तुत करना चाहिए। भगवद्गीता का उपदेश निंदात्मक नहीं है - वह केवल यह समझाता है कि क्या करना उचित है और क्या करना उचित नहीं है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 20
अध्याय 17 • श्लोक 20 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥१७-२०॥

भावार्थ: जो दान प्रतिफल की आशा किए बिना, उचित जगह पर, शुभ काल में, योग्य प्राप्तकर्त्ता को इस तरह के मनोभव से दिया जाए कि इस दान को दिया जाना ही चाहिए, वह दान सत्त्वगुण में होता है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 21
अध्याय 17 • श्लोक 21 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥१७-२१॥

भावार्थ: किन्तु, जिस दान को अनच्छापूर्वक, प्रत्युपकार की आशा एवं प्रतिफल की स्वार्थी आकांक्षा सहित दिया जाए, वह दान रजोगुण में होता है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 22
अध्याय 17 • श्लोक 22 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमअवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥१७-२२॥

भावार्थ: जिस दान को आदर से, अनुचित समय एवं अनुचित जगह पर, एक अयोग्य प्राप्तकर्त्ता को दिया जाता है, उस दान को तमोगुण में कहा जाता है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 22
अध्याय 17 • श्लोक 22 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

॥ अनुवृत्ति ॥

भावार्थ: यहाँ पर अब दान के आदर्शों पर चर्चा हो रही है - किस प्रकार का दान, किसे और किस उद्देश्य से दिया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य बनता है कि वह अपने अन्य मानवी साथियों का ख्याल करे। वैसे तो इस संसार में कोई भी भूखा नहीं सोना चाहिए, कोई भी कपड़ों, उचित मकान, शिक्षा, या पर्याप्त चिकित्सा सुविधा के रहित नहीं होना चाहिए। ऐसी सुव्यवस्था को मनुष्य समाज में एक आदर्श स्थिति मानी जएगी। किन्तु आज की वास्तविक परिस्थिति बिल्कुल ही अलग है - आज संसार में कई ऐसी जगह हैं जहां पर खाने का अभाव है, कपड़े का, रहने की जगह का, शिक्षा का, एवं चिकित्सा सुविधा का अभाव है, जिस के कारण करोड़ों लोग व्यर्थ ही कष्ट उठा रहे हैं। किंतु केवल चीजों के अभाव के कारण इतना कष्ट नहीं है जितना की कुशासन और जमाखोरी के कारण है। इस धरती पर सबके अच्छे सेहत और खुशहाली के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपस्थित हैं, किंतु इन सुविधाओं का ठीक से प्रबंध नहीं हो रहा है। और दुनिया में सुविधा-सम्पन्न और साधनहीन लोगों के बीच हो रहे कुशासन से भी बढ़कर दोष जमाखोरी का है। मानवजाति के सामने खड़े तमाम समस्याओं को, विशेषकर भूख की समस्या को आसानी से मिटाने के लिए पर्याप्त धन उपस्थित है - किंतु इस धन को केवल थोड़े से लोग बटोरकर बैठे हैं। इन लोगों ने इतना सारा धन संचित किया है कि कोई एक व्यक्ति उस धन को एक जनम में तो क्या अगले सात जन्मों में भी खर्च न कर सकेगा। बड़े बड़े कोर्पोरेट कम्पनियों को करोड़ों डोलर सालाना बोनस मिलता है, जबकि दूसरी ओर हर साल करोड़ों बच्चे भूखे मरते हैं। क्या यह शर्मनाक परिस्थिति नहीं है? इस अध्याय में चर्चित अन्य विषयों की तरह दान-कार्यों के भी विभिन्न प्राकृतिक स्वभाव होते हैं जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि दान कैसे और किसे दिया जा रहा है। जैसे कि श्री कृष्ण पिछले कुछ श्लोकों में कहते हैं, दान-कार्य सत्त्वगुण, रजोगुण या तमोगुण में होते हैं, किन्तु, अंततः सर्वोच्च दान तो वही है जो मनुष्य के सभी भौतिक क्लेशों के साथ साथ मृत्यु को भी समाप्त कर दे। इस प्रकार भगवद्गीता में पाए जाने वाले आध्यात्मिक संपत्ति का दान ही सर्वोच्च दान है। इस बात की जानकारी न होना कि हम कौन हैं, हम कहां से आए हैं, जीवन का उद्देश्य क्या है, और मृत्यु के पश्चात हम कहां जाएंगे, यही इस संसार के सभी दुःखों का मूल कारण है। जो इन बातों को भगवद्गीता के दृष्टिकोण से समझता है वह ज्ञान संपन्न है, स्वयं की शारीरिक धारणा की माया से मुक्त है, और अंत में वह मृत्यु को भी परास्त कर देता है। यही सर्वोच्च प्रकार का दान है जो कोई अपने मानवी साथियों को दे सकता है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 23
अध्याय 17 • श्लोक 23 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणাস্তेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥१७-२३॥

भावार्थ: वेदों में बताया गया है कि “ॐ तत् सत्” के तीन शब्द परम-सत्य को दर्शाते हैं। प्राचीन समय में, ब्राह्मण, वेद और यज्ञ की विधियां इन तीन शब्दों द्वारा उद्भव हुए थे।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 24
अध्याय 17 • श्लोक 24 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

तस्मादومित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततम् ब्रह्मवादिनाम् ॥१७-२४॥

भावार्थ: इसलिए, जो परम-सत्य की खोज करते हैं वे यज्ञ के आरंभ में सदैव ॐ शब्द का उच्चारण करते हैं, दान देते हैं, तपस्या करते हैं, एवं वेदों में निर्धारित अन्य कार्यों का भी निर्व्हन करते हैं।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 25
अध्याय 17 • श्लोक 25 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥१७-२५॥

भावार्थ: मोक्ष की इच्छा करने वाले “तत्” शब्द के उच्चारण द्वारा, प्रतिफल भोगने की स्वार्थी इच्छा को त्याग करके, तरह तरह के यज्ञ, तपस्या, एवं दान-धर्म का पालन करते हैं।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 26
अध्याय 17 • श्लोक 26 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥१७-२६॥

भावार्थ: ‘सत’ शब्द परम-सत्य के स्वभाव को एवं परम-सत्य की जिज्ञासा करने वाले साधुओं के स्वभाव को सूचित करता है। इसलिए, हे पार्थ, सभी सत्कार्यों के अंतर्गत ‘सत’ शब्द का उच्चारण किया जाता है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 27
अध्याय 17 • श्लोक 27 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥१७-२७॥

भावार्थ: यज्ञ, तपस्या, एवं दान-कार्य के निर्व्हन में स्थिरता को ‘सत’ कहा जाता है। परमेश्वर के प्रति किए जाने वाले किसी भी कार्य को ‘सत’ कहा जाता है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 28
अध्याय 17 • श्लोक 28 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥१७-२८॥

भावार्थ: हे पार्थ, किसी भी यज्ञ, तपस्या, दान-धर्म या किसी भी क्रिया को यदि श्रद्धापूर्वक किया जाए, तो वह ‘असत्’ (मिथ्या) कहलाता है। इस प्रकार के कार्य, इस जन्म में तो क्या अगले जनम में भी कोई मंगलदायक प्रतिफल उत्पन्न नहीं करते।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 28
अध्याय 17 • श्लोक 28 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

॥ अनुवृत्ति ॥

भावार्थ: अपनी मनमानी से आचरण करने वालो को इस जन्म में तो क्या, अगले जन्म में भी सुख या सिद्धि प्राप्त नहीं होती। इसलिए हमें भगवद्गीता के आदेशों के अनुसार सभी तपस्या, यज्ञ एवं दान-कार्यों को सत्त्वगुण में करना चाहिए, क्योंकि रजोगुण और तमोगुण से व्यक्ति की चेतना कलुषी होती है। यहाँ बताया गया है कि प्राचीन काल में वेदों के सभी कार्यों एवं व्यादेशों को, परम-सत्य परमपुरुष श्री कृष्ण को सूचित करनेवाले ‘ॐ तत् सत्’ के शब्दों के उच्चारण सहित ही संपन्न किया जाता था। परन्तु कलियुग में इस पद्धति का अब प्रचलन नहीं रहा। इसके विपरीत, लोग मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य भूल चुके हैं, और शोचनीय ढंग से लक्ष्यहीन होकर अपना जीवन केवल खाने, मद्यपान करने, और मौज उड़ाने में व्यतीत कर रहे हैं। श्री कृष्ण ने भगवद्गीता में पहले ही कहा है कि जो कुछ एक महान व्यक्ति करते हैं, साधारण लोग भी वही करते हैं (यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः)। अतः, हम इस दुनिया के सभी भले पुरुष एवं महिलाओं से निवेदन करते हैं कि तुरन्त भगवद्गीता का सन्देश का श्रवण करें और श्री कृष्ण को परम भगवान मान लें। भगवद्गीता के ध्वज के तले दुनिया में इस तरह का आन्दोलन अवश्य मानवजाति के लिए सबसे सौभाग्यदायक एवं कल्याणकारी सिद्ध होगा। इससे बेहतर भलाई कोई कर नहीं सकता, और इसे करने के लिए प्रस्तुत समय से बेहतर और कोई समय नहीं। एकं शास्त्रं देवकी-पुत्र-गीतम् । एको देवो देवकी-पुत्र एव ॥ एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि । कर्मआपक्यं तस्य देवस्य सेवा ॥ भगवद्गीता ही सबसे आदर्श शास्त्र है, जिसे देवकी-पुत्र भगवान श्री कृष्ण ने गाया था। श्री कृष्ण ही परम-सत्य हैं। जपने के लिए महामन्त्र ही सर्वोच्च मन्त्र है, और सभी का परम कर्त्तव्य है परम-पुरुष श्री कृष्ण की सेवा। (गीता-माहात्म्य ७)

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
Slock 29
अध्याय 17 • श्लोक 29 संस्कृत श्लोक 0 श्रोता

ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां
वैयासिक्यां भीष्मपर्वाणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥

भावार्थ: ॐ तत् सत् - अतः व्यास विरचित शतसहस्र श्लोकों की श्री महाभारत ग्रन्थ के भीष्म-पर्व में पाए जाने वाले आध्यात्मिक ज्ञान का योग-शास्त्र - श्रीमद् भगवद् गीतोपनिषद् में श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद से लिए गए श्रद्धात्रयविभाग योग नामक सत्रहवें अध्याय की यहां पर समाप्ती होती है।

भक्ति की सभा • bhaktikisabha.com

पोस्टर
सत्संगी विचार

लोड हो रहा है...

सत्संगी श्रोता सूची
इस श्लोक को सम्पूर्ण सुनने वाले श्रद्धालु:

लोड हो रहा है...