भक्ति की सभा
ॐ
श्रीमद्भागवत महापुराण
PURAN उपलब्ध (Available) महर्षि वेदव्यास प्रणीत

श्रीमद्भागवत महापुराण

भगवान श्रीकृष्ण की बाल व रास लीलाओं और नवधा भक्ति का सर्वोच्च महाग्रंथ।

अनुवाद भाषाएं (8):
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कुल अध्याय 18
कुल श्लोक 717

समस्त अध्याय

अध्याय चुनकर श्लोक, उच्चारण व भावार्थ वाचन प्रारंभ करें।

अर्जुनविषादयोगः
अध्याय 1

अर्जुनविषादयोगः

सैन्य-दर्शन (कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य-निरीक्षण)

कुरुक्षेत्र के धर्मक्षेत्र में दोनों सेनाओं का एकत्रीकरण, अर्जुन का दोनों पक्षों के बंधु-बांधवों को देखकर विषादग्रस्त व मोहग्रस्त होना तथा गाण्डीव रखकर युद्ध से विमुख होना।

50 श्लोक श्लोक पढ़ें
सांख्ययोगः
अध्याय 2

सांख्ययोगः

सांख्य योग (गीता का सार व निष्काम कर्म)

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को आत्मा की अमरता, देह की नश्वरता, स्वधर्म पालन, निष्काम कर्मयोग तथा स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षणों का दिव्य उपदेश।

85 श्लोक श्लोक पढ़ें
कर्मयोगः
अध्याय 3

कर्मयोगः

कर्म योग (कर्म का विज्ञान व अनासक्ति)

कर्म संन्यास की तुलना में निष्काम कर्मयोग की श्रेष्ठता, यज्ञ चक्र, लोक-संग्रह हेतु श्रेष्ठ पुरुषों का आचरण तथा काम-क्रोध रूपी अंतःशत्रुओं पर विजय।

51 श्लोक श्लोक पढ़ें
ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः
अध्याय 4

ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः

ज्ञान योग (दिव्य ज्ञान व अवतार रहस्य)

परम्परा से प्राप्त ज्ञान, भगवान के अवतार का दिव्य रहस्य (यदा यदा ही धर्मस्य), कर्म-अकर्म-विकर्म का विवेक तथा ज्ञान रूपी अग्नि द्वारा समस्त पापों का भस्म होना।

49 श्लोक श्लोक पढ़ें
कर्मसंन्यासयोगः
अध्याय 5

कर्मसंन्यासयोगः

कर्म संन्यास योग (कर्मयोग व कर्मसंन्यास की एकता)

संन्यास और कर्मयोग का एक ही गंतव्य होना, कर्तापन के अभिमान से मुक्ति, समदर्शी ज्ञानियों की दृष्टि तथा ब्रह्म-निर्वाण की परम शांति।

33 श्लोक श्लोक पढ़ें
आत्मसंयमयोगः (ध्यानयोगः)
अध्याय 6

आत्मसंयमयोगः (ध्यानयोगः)

ध्यान योग (मन का निग्रह व आत्मसंयम)

अष्टांग योग व ध्यान की विधि, मन को वश में करने का अभ्यास और वैराग्य, योगी की समता तथा योगभ्रष्ट साधक की सद्गति।

53 श्लोक श्लोक पढ़ें
ज्ञानविज्ञानयोगः
अध्याय 7

ज्ञानविज्ञानयोगः

ज्ञान-विज्ञान योग (परम सत्य का बोध)

परा और अपरा प्रकृति का विवेचन, त्रिगुणमयी माया से तरने की शरणगति, चार प्रकार के भक्त (आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु, ज्ञानी) तथा अनन्य भक्ति की महिमा।

38 श्लोक श्लोक पढ़ें
अक्षरब्रह्मयोगः
अध्याय 8

अक्षरब्रह्मयोगः

तारक-ब्रह्म योग (अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति)

ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव व अधियज्ञ का रहस्य, अंतकाल में ॐ के ध्यान से भगवत्प्राप्ति तथा शुक्ल व कृष्ण गति का वर्णन।

35 श्लोक श्लोक पढ़ें
राजविद्याराजगुह्ययोगः
अध्याय 9

राजविद्याराजगुह्ययोगः

राजगुह्य योग (परम गोपनीय ज्ञान व भक्ति)

विद्याओं का राजा और परम गोपनीय ज्ञान, सर्वव्यापी ईश्वर भाव, अनन्य चिंतयन्तो मां का महासंकल्प तथा पत्रं पुष्पं फलं तोयं का सहज समर्पण।

42 श्लोक श्लोक पढ़ें
विभूतियोगः
अध्याय 10

विभूतियोगः

विभूति योग (ईश्वर का ऐश्वर्य व विस्तार)

समस्त चराचर जगत में भगवान की प्रधान विभूतियों का प्रकटीकरण—आदित्यों में विष्णु, ज्योतियों में सूर्य, वेदों में सामवेद, और पांडवों में धनंजय।

48 श्लोक श्लोक पढ़ें
विश्वरूपदर्शनयोगः
अध्याय 11

विश्वरूपदर्शनयोगः

विश्वरूपदर्शन योग (विराट स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन)

अर्जुन की प्रार्थना पर भगवान द्वारा दिव्य चक्षु प्रदान कर अपने अनंत मुख, नेत्र व भुजाओं वाले महाकाल विश्वरूप का साक्षात् दर्शन कराना।

63 श्लोक श्लोक पढ़ें
भक्तियोगः
अध्याय 12

भक्तियोगः

भक्ति योग (सगुण-साकार प्रेम व भक्ति मार्ग)

सगुण साकार एवं निर्गुण निराकार उपासना का अंतर, भक्ति की सुगमता, तथा भगवान के प्रिय भक्त के दिव्य सद्गुणों का वर्णन।

26 श्लोक श्लोक पढ़ें
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः
अध्याय 13

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः

प्रकृति-पुरुष विवेक योग (शरीर व आत्मा का भेद)

क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा/परमात्मा) का सूक्ष्म भेद, ज्ञान के बीस लक्षण, तथा प्रकृति और पुरुष के संयोग से सृष्टि का संचालन।

42 श्लोक श्लोक पढ़ें
गुणत्रयविभागयोगः
अध्याय 14

गुणत्रयविभागयोगः

गुणत्रय विभाग योग (सत्त्व, रज और तम गुण)

प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के लक्षण, उनके बंधन का स्वरूप, मृत्यु के बाद गुणों के अनुसार गति तथा गुणातीत महापुरुष की स्थिति।

33 श्लोक श्लोक पढ़ें
पुरुषोत्तमयोगः
अध्याय 15

पुरुषोत्तमयोगः

पुरुषोत्तम योग (अश्वत्थ वृक्ष व परम पुरुष)

उर्ध्वमूल वाले संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष का छेदन, क्षर और अक्षर पुरुष से परे पुरुषोत्तम परमात्मा का साक्षात्कार।

26 श्लोक श्लोक पढ़ें
दैवासुरसंपद्विभागयोगः
अध्याय 16

दैवासुरसंपद्विभागयोगः

दैवासुर संपद विभाग योग (दैवीय व आसुरी प्रवृत्तियां)

अभय, अहिंसा, सत्य आदि 26 दैवीय संपदाएं तथा दंभ, दर्प, क्रोध, अज्ञान आदि आसुरी लक्षणों का स्पष्ट विभाजन एवं काम-क्रोध-लोभ रूपी नरक के तीन द्वार।

30 श्लोक श्लोक पढ़ें
श्रद्धात्रयविभागयोगः
अध्याय 17

श्रद्धात्रयविभागयोगः

श्रद्धात्रय विभाग योग (श्रद्धा, आहार व तप के तीन भेद)

मनुष्यों की श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप और दान के सात्त्विक, राजसिक व तामसिक तीन-तीन भेद तथा ॐ तत्सत् की पावन महत्ता।

36 श्लोक श्लोक पढ़ें
मोक्षसंन्यासयोगः
अध्याय 18

मोक्षसंन्यासयोगः

मोक्ष योग (परम संन्यास, शरणागति व विजय)

त्याग और संन्यास का अंतिम निर्णय, वर्णधर्म अनुसार कर्म, सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज की परम शरणागति तथा यत्र योगेश्वरः कृष्णो की विजय उद्घोषणा।

93 श्लोक श्लोक पढ़ें
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