श्रीमद्भागवत महापुराण
भगवान श्रीकृष्ण की बाल व रास लीलाओं और नवधा भक्ति का सर्वोच्च महाग्रंथ।
समस्त अध्याय
अध्याय चुनकर श्लोक, उच्चारण व भावार्थ वाचन प्रारंभ करें।
अर्जुनविषादयोगः
कुरुक्षेत्र के धर्मक्षेत्र में दोनों सेनाओं का एकत्रीकरण, अर्जुन का दोनों पक्षों के बंधु-बांधवों को देखकर विषादग्रस्त व मोहग्रस्त होना तथा गाण्डीव रखकर युद्ध से विमुख होना।
सांख्ययोगः
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को आत्मा की अमरता, देह की नश्वरता, स्वधर्म पालन, निष्काम कर्मयोग तथा स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षणों का दिव्य उपदेश।
कर्मयोगः
कर्म संन्यास की तुलना में निष्काम कर्मयोग की श्रेष्ठता, यज्ञ चक्र, लोक-संग्रह हेतु श्रेष्ठ पुरुषों का आचरण तथा काम-क्रोध रूपी अंतःशत्रुओं पर विजय।
ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः
परम्परा से प्राप्त ज्ञान, भगवान के अवतार का दिव्य रहस्य (यदा यदा ही धर्मस्य), कर्म-अकर्म-विकर्म का विवेक तथा ज्ञान रूपी अग्नि द्वारा समस्त पापों का भस्म होना।
कर्मसंन्यासयोगः
संन्यास और कर्मयोग का एक ही गंतव्य होना, कर्तापन के अभिमान से मुक्ति, समदर्शी ज्ञानियों की दृष्टि तथा ब्रह्म-निर्वाण की परम शांति।
आत्मसंयमयोगः (ध्यानयोगः)
अष्टांग योग व ध्यान की विधि, मन को वश में करने का अभ्यास और वैराग्य, योगी की समता तथा योगभ्रष्ट साधक की सद्गति।
ज्ञानविज्ञानयोगः
परा और अपरा प्रकृति का विवेचन, त्रिगुणमयी माया से तरने की शरणगति, चार प्रकार के भक्त (आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु, ज्ञानी) तथा अनन्य भक्ति की महिमा।
अक्षरब्रह्मयोगः
ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव व अधियज्ञ का रहस्य, अंतकाल में ॐ के ध्यान से भगवत्प्राप्ति तथा शुक्ल व कृष्ण गति का वर्णन।
राजविद्याराजगुह्ययोगः
विद्याओं का राजा और परम गोपनीय ज्ञान, सर्वव्यापी ईश्वर भाव, अनन्य चिंतयन्तो मां का महासंकल्प तथा पत्रं पुष्पं फलं तोयं का सहज समर्पण।
विभूतियोगः
समस्त चराचर जगत में भगवान की प्रधान विभूतियों का प्रकटीकरण—आदित्यों में विष्णु, ज्योतियों में सूर्य, वेदों में सामवेद, और पांडवों में धनंजय।
विश्वरूपदर्शनयोगः
अर्जुन की प्रार्थना पर भगवान द्वारा दिव्य चक्षु प्रदान कर अपने अनंत मुख, नेत्र व भुजाओं वाले महाकाल विश्वरूप का साक्षात् दर्शन कराना।
भक्तियोगः
सगुण साकार एवं निर्गुण निराकार उपासना का अंतर, भक्ति की सुगमता, तथा भगवान के प्रिय भक्त के दिव्य सद्गुणों का वर्णन।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः
क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा/परमात्मा) का सूक्ष्म भेद, ज्ञान के बीस लक्षण, तथा प्रकृति और पुरुष के संयोग से सृष्टि का संचालन।
गुणत्रयविभागयोगः
प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के लक्षण, उनके बंधन का स्वरूप, मृत्यु के बाद गुणों के अनुसार गति तथा गुणातीत महापुरुष की स्थिति।
पुरुषोत्तमयोगः
उर्ध्वमूल वाले संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष का छेदन, क्षर और अक्षर पुरुष से परे पुरुषोत्तम परमात्मा का साक्षात्कार।
दैवासुरसंपद्विभागयोगः
अभय, अहिंसा, सत्य आदि 26 दैवीय संपदाएं तथा दंभ, दर्प, क्रोध, अज्ञान आदि आसुरी लक्षणों का स्पष्ट विभाजन एवं काम-क्रोध-लोभ रूपी नरक के तीन द्वार।
श्रद्धात्रयविभागयोगः
मनुष्यों की श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप और दान के सात्त्विक, राजसिक व तामसिक तीन-तीन भेद तथा ॐ तत्सत् की पावन महत्ता।
मोक्षसंन्यासयोगः
त्याग और संन्यास का अंतिम निर्णय, वर्णधर्म अनुसार कर्म, सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज की परम शरणागति तथा यत्र योगेश्वरः कृष्णो की विजय उद्घोषणा।