सरल भावार्थ (हिंदी):
कहा गया है कि इस अध्याय के श्लोक ८ से लेकर श्लोक ११ तक में, श्रीमद्भागवद्गीता का तात्त्विकि सिद्धान्त निहित है। यहां, श्री कृष्ण स्थापित करते हैं, कि वे स्वयं ही भौतिक और आध्यात्मिक जगत के स्रोत हैं, एवं ब्रह्मन व परमात्मा की उत्पत्ति के कारण हैं। “सर्वस्य” शब्द के उपयोग से, श्रीकृष्ण प्रमाणित करते हैं कि वे स्यवं वैकुण्ठ के नारायण के भी स्रोत हैं (जो सभी शक्तियों के स्वामी हैं)।
देवताओं के समूह में, हम यह पाते हैं की ब्रह्माजी सत्य-लोक के स्वामी हैं, शिवजी शिव-लोक के स्वामी हैं, इन्द्रजी इन्द्र-लोक के स्वामी हैं, परन्तु कहीं भी हम यह नहीं पाते हैं कि कोई भी व्यक्ति/देव सभी के स्वामी एवं उत्पत्ति के कारण (स्रोत) हैं, सिवाय श्रीकृष्ण के। यह समझ कि श्री कृष्ण सर्वस्व हैं, बुद्धिमानों को श्री कृष्ण की हृदय से प्रेमपूर्वक पूजा करने के लिए प्रेरित करता है।
श्री कृष्ण कहते हैं, मत्-चित्ता - सदैव मेरा चिन्तन करें एवं मेरा ध्यान करें; मद्-गत-प्राणा - अपना जीवन मुझ पर समर्पित करें। बुद्धिमान व्यक्तियों की संगत में मेरी चर्चा में संलग्न होकर (कथयन्तः), एक दूसरे को अनुप्राणित एवं ज्ञान से आलोकित करें (बोधयन्तः)। यही मन और इद्रियों के लिए उचित ध्यान और कार्य है।
कृष्ण के बारे में चर्चा को कृष्ण-कथा या श्रवण और कीर्तन कहते हैं। इसका अर्थ श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवतम् और ऐसे अन्य साहित्यों का श्रवण एवं पाठ करना और संकीर्तन करना, यानी की महा-मंत्र का सामूहिक जाप करना -
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
श्रीकृष्ण के नाम और क्रियाकलापों का श्रवण और जाप करना ही योग की सर्वोच्च पद्धति है। कृष्ण पद्म-पुराण में पुष्टि करते हैं कि जहां भी उनके नाम का जप होता है वे वही निवास करते हैं।
नाहं तिष्ठामि वैकुण्ठे योगिनां हृदयेषु वा ।
तत्र तिष्ठामि नारद यत्र गायन्ति मद्भक्ताः ॥
न ही मैं वैकुण्ठ में बसता हुुँ, न ही कनिष्ठ योगियों के हृदय में। मैं वहीं वास करता हुुँ, जहां मेरे भक्त मेरी क्रियाकलापों का महिमामंडन करते हैं तथा मेरा नाम जपते हैं। (पद्म-पुराण)
कुल मिलाकर, कृष्ण की भक्ति में स्वयं को पूरी तरह से संलग्न करने के लिए भक्ति-योग में नौ प्रक्रियाएं हैं। इनमें से, श्रवण और कीर्तन सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण हैं -
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन् नव-लक्षणा ॥
महा-मंत्र और विष्णु या कृष्ण की लीलाओं का श्रवण एवं कीर्तन करना, उनका स्मरण करना, उनके चरण-कमलों की सेवा करना, उनकी आदरपूर्वक पूजा करना, उनका सेवक बनना, उन्हें अपना सबसे प्रिय मित्र मानना, और अपना सर्वस्व उन पर समर्पण कर देना। इन नौ प्रक्रियाओं को भक्ति-योग के रूप में स्वीकार किया जाता है। (श्रीमद्भागवतम् ७.५.२३)।
श्लोक १० में प्रीति-पूर्वकम् शब्द का उपयोग हुआ है। प्रीति का अर्थ है प्रेम, लेकिन इस प्रेम को इस भौतिक संसार में बद्ध-जीवों के बीच साझा किए जाने वाले प्यार और स्नेह के साथ मिलाकर अपनी समझ को उलझाना नहीं चाहिए। “प्रीति” ऐसी शुद्ध-स्नेह की स्थिति है जिसमें स्वार्थ या सांसारिक वासनाओं की कोई अभिव्यक्ति नहीं देखी जाती। श्रीकृष्ण को पूजने के लिए इस तरह के प्रेम की आवश्यकता होती है और ऐसा प्रेम ही उनके साथ एक शाश्वत बंधन प्राप्त करने की कुंजी है। जिन लोगों को भक्ति-योग द्वारा श्रीकृष्ण के लिए ऐसा प्रेम प्राप्त है, वे लगातार उनके द्वारा शुद्ध भक्ति (बुद्धी-योग) की प्रेरणा से सशक्त होते हैं, जिससे वे उनके (श्रीकृष्ण) पास आ सकते हैं।
श्रीकृष्ण, परमात्मा (परम चेतना) के रूप में सभी जीवों के हृदय में बसते हैं, और उनके संसार में भ्रमण का निर्देशन करते हैं। जब कोई कृष्ण को जानने, कृष्ण की सेवा करने और उनके साथ एक शाश्वत संबंध में प्रवेश करने की इच्छा रखता है, तो उनके लिए करुणा के कारण, कृष्ण व्यक्तिगत रूप से उनके हृदय में प्रकट होते हैं और ज्ञान के रोशन चिराग द्वारा अज्ञान से पैदा हुए अंधकार को नष्ट कर देते हैं। यह कहा गया है कि श्रीकृष्ण प्रकाश हैं और अज्ञान अंधकार है -
कृष्ण-सूर्य-सम माया हय अन्धकार ।
याहां कृष्ण ताहां नाहि मायार अधिकार ॥
कृष्ण की तुलना सूर्य से की जाती है और माया (अज्ञान) अंधेरे की तरह है। जहां भी कृष्ण हैं वहां कभी अंधेरा नहीं हो सकता। (चैतन्य चरितामृत, मध्य-लीला २२.३१)
जब भी रोशनी दिखाई देती है वहां अंधेरा परास्त हो जाता है। इस प्रकार, जब कृष्ण व्यक्तिगत रूप से भक्ति-योगी के हृदय में प्रकट होते हैं, तो सभी अंधकार और निराशा गायब हो जाते हैं, और एक अति प्रबुद्ध हो जाता है। यह भगवद्गीता का सारांश है।
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