सरल भावार्थ (हिंदी):
ब्रह्मन (ब्रह्म-ज्योति) श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप की कांति है। उसी रूप में वह शाश्वत, अगाध, अचिन्त्य, अविकारी, सर्वव्यापी, अचल, और सर्वशक्तिमान है। विष्णु-पुराण में इसका उल्लेख इस प्रकार है -
यत्तदव्यक्तमजरमचिन्त्यमजमक्षयम् ।
अनिर्देश्यमरूपं च पाणिपादाद्यसंयुतम् ॥
विभुं सर्वगतं नित्यं भूतयोनिमकारणम् ।
व्याप्य व्याप्त्यतः सर्वं तद्वै पश्यन्ति सूरयः ॥
परम सत्य का ब्रह्मन तत्त्व अव्यक्त, समय से अप्रभावित, अचिन्त्य, भौतिक स्रोत रहित, अक्षय व अक्षीण, अनिर्वचनीय, निराकार, बिना हाथों पैरों या अन्य अंगों के, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, शाश्वत, भौतिक पदार्थों का स्रोत, भौतिक कारण रहित, सभी वस्तुओं में उपस्थित, हालांकि कोई भी वस्तु उसमे स्थित नहीं, भौतिक जगत का उद्गम, और दिव्य दर्षियों के दृष्टि का विषय है। (विष्णु-पुराण ६.५.६६-६७)
श्रीकृष्ण की कांति उनसे अलग नहीं है, और वे करोड़ों सूर्यों की तरह ज्योतिर्मय हैं।
वासुदेवाद्भिन्नस्तु वह्न्यर्केन्दुशतप्रभम् ।
वासुदेवोऽपि भगवान् स्तद्धर्मा परमेश्वरः ॥
सर्वां दीप्तिं क्षोभयत्येव तेजसा तेन वै युतम् ।
प्रकाशरूपो भगवानच्युतश्चासकृद् द्विज ॥
अवैयक्तिक ब्रह्म-ज्योति का तेज अनन्त ज्वालाओं, सूर्यों और चंद्रों की भांति है। ब्रह्म-ज्योति वासुदेव (कृष्ण) से अभिन्न है। वासुदेव सर्वमंगल गुणों से भरपूर हैं और उनका स्वभाव ऐसा है कि वे ही परम नियंत्रक हैं। जब वे अपने ब्रह्म-ज्योति के आवरण को हटाते हैं, तब कृष्ण अपना मूल, नित्य, एवं दिव्य स्वरूप प्रकट करते हैं। (नारद पञ्चरात्र)
अव्यक्त में मोक्ष वे लोग चाहते हैं जो भौतिक अस्तित्व से निराश हैं, किंतु उन्हें कृष्ण का कोई ज्ञान नहीं होता। अवश्य भौतिक गतिविधियों से उदासीनता व निवृत्ति की भावना सराहनीय है, परन्तु कृष्ण कहते हैं कि इस मार्ग में बहुत ही परेशानियां हैं।
यदि कोई हर स्थिति में समान रहकर, अव्यक्त ब्रह्म-ज्योति के लिए साधना करता है, और उसी समय अन्य जीवों की सहायता हेतु तत्पर रहता है, तो ऐसा व्यक्ति अंततः कृष्ण चेतना के स्तर पर पहुंच सकता है। परन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं कि अव्यक्त का मार्ग अत्यंत कष्टकर है और दुष्प्राप्य है। अतः, अपेक्षित है कि ऐसे पथ पर आरोहण करते अनेक जीवनकाल निकल जाते हैं, और सम्पूर्ण विफलता एवं नुकसान की भी संभावना होती है।
जैसा कि उपर कहा गया है, ब्रह्मवादियों को वेदाध्ययन के साथ साथ इन्द्रियों का नियंत्रण भी करना चाहिए। अनेक जीवनकाल के पश्चात, ज्ञान की साधना से, जब ब्रह्मवादी यह समझ लेते हैं कि श्रीकृष्ण ही सबकुछ हैं (वासुदेवः सर्वमिति), तब अंततः वे श्रीकृष्ण के पास पहुंचते हैं। शून्यवादी और मायावादी तब तक कृष्ण के पास नहीं पहुंचते जब तक की वे भक्ति-योग का मार्ग न अपना लें। परन्तु, एक वैष्णव, श्रीकृष्ण के पास एक ही जीवनकाल में पहुंच सकते हैं।
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