॥ अनुवृत्ति ॥
Anuvratti (13.20 - 13.26)
सरल भावार्थ (हिंदी):
यह वर्णित है कि भौतिक प्रकृति और जीवित प्राणी (जीवात्मा या पुरुष) दोनों ही अनादि हैं। इसका अर्थ यह है कि भौतिक प्रकृति और जीवात्मा श्री कृष्ण की नित्य शक्तियों के रूप में सृष्टि की रचना के पहले से ही उपस्थित हैं। जीवात्मा का स्त्रोत या उत्पत्ति समय के शुरू होने से पहले तटस्थ स्तर – भौतिक और आध्यात्मिक स्तर के किनारे में है। इस संबंध में, जीवों की उत्पत्ति और भौतिक प्रकृति दोनों ही अनादि काल से है और इनका कोई पहला कारण नहीं है। वे बिना किसी प्रथम कारण के हैं क्योंकि वे शक्तियां हैं, या यह कहें की वे भगवान् की शक्तियां हैं जो स्वयं ही अनादि या बिना स्रोत के हैं। दूसरे शब्दों में, सभी कारणों के कारण श्रीकृष्ण हैं। इसलिए उन्हें सर्व-कारण-कारणं कहा जाता है।
हालांकि भौतिक प्रकृति और जीवात्मा दोनों ही अनादी एवं नित्य हैं, फिर भी उनके गुण और विशेषताएं विभिन्न हैं। वे एक जैसे नहीं हैं। भौतिक प्रकृति को शरीर, इद्रियों और अन्य तत्वों के साथ-साथ सुख, दुःख, विलाप और भ्रम जैसे गुणों के परिवर्तनों के रूप में वर्णित किया जाता है। जीवात्मा परम पुरुष के अवयवभूत अंश हैं। वे सत्-चित्-आनन्द हैं - यानी उनका स्वभाव नित्यत्व, ज्ञान एवं आनंद से परिपूर्ण है। जब जीवित प्राणी स्वयं को भौतिक शरीर के रूप में समझते हैं, तो वे सुख एवं दुःख के कष्ट को भुगतते हुए जन्म एवं मृत्यु के चक्र में एक शरीर से दूसरे शरीर में निरंतर देहांतरण करते रहते हैं।
जीवन के सबसे मुख्य प्रश्नों में से एक प्रश्न, “हम कहाँ से आये हैं?” का निश्चित रूप से श्रीमद्भगवद्गीता में उत्तर दिया गया है। फिर भी श्लोक २० में अनादी शब्द के प्रयोग ने कुछ विचारकों को यह निष्कर्ष निकालने के लिए प्रोत्साहित किया है कि जीवात्मा सदैव भौतिक दुनिया में ही रहे हैं। दूसरे शब्दों में, यद्यपि जीवित प्राणी शाश्वत हैं, वे भौतिक ब्रह्मांड में ही शुरू होते हैं और सदैव भौतिक ब्रह्मांड में ही रहे हैं। किंतु इस निष्कर्ष का भगवद्गीता के पूर्ववर्ती आचार्यों, जैसे कि श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती, श्री बलदेव विद्याभूषण और अन्यों ने समर्थन नहीं किया है। उनके लिए, अनादि का अर्थ है प्रारंभ-विहीन, या समय के शुरू होने से पहले। जीवात्माओं की उत्पत्ति और अनादि में उनकी शुरुआत के बारे में, वैष्णव आचार्य स्वामी बी. आर. श्रीधर महाराज कहते हैं -
चिरकाल से, मनुष्य ने जीव की उत्पत्ति के बारे में पूछताछ की है। मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? जीव इस संसार में पहली बार कैसे प्रकट हुआ? आध्यात्मिक अस्तित्व के किस चरण में उसका इस भौतिक संसार में पतन हुआ?
इस संसार में आने वाले जीवों के दो वर्ग हैं। एक वर्ग वे हैं जो श्री कृष्ण की अनंत नित्य-लीला की आवश्यकता के कारण आध्यात्मिक वैकुण्ठ लोकों से आते हैं। दुसरे जो व्यवस्थानुरूप आवश्यकता से आते हैं। ब्रह्म-ज्योति, जो की अविभेदित तटस्थ स्तर है, वह अनंत जीवात्माओं, आध्यात्मिक आणविक कणों का स्रोत है।
परम पुरुष के पारलौकिक शरीर की किरणों को ब्रह्म-ज्योति के रूप में जाना जाता है, और ब्रह्म-ज्योति का एक किरण एक जीवात्मा है। जीवात्मा उस प्रभा का एक कण है, और ब्रह्म-ज्योति अनंत जीवात्मा-कणों का सामूहिक परिणाम है। आमतौर पर, जीवात्मा ब्रह्म-ज्योति से निर्गत होती है जो सजीव है और बढ़ रहा है। ब्रह्म-ज्योति के भीतर, किसी प्रकार से उसके संतुलन में विघ्न उत्पन्न होता है और संचलन शुरू होता है। अविभेद से भेद शुरू होता है। संयुक्त चेतना से व्यक्तिगत चेतना की इकाइयां (आत्माएं) उभरती हैं। और क्योंकि जीवात्मा सचेत है वह स्वतंत्र इच्छा से संपन्न है। सीमांत स्थिति (तटस्था-शक्ति) से वे या तो शोषण (भौतिक संसार) या समर्पण (वैकुंठ) का पक्ष चुनते हैं। कृष्ण भूलि से जीव अनादि बहिर्मुखा - अनादि का अर्थ है जिस की कोई शुरुआत नहीं। जब हम शोषण की भूमि में प्रवेश करते हैं, हम समय, स्थान और विचार के उपादान के भीतर आते हैं। और जब हम शोषण करने के लिए आते हैं, ऋण की नकारात्मक भूमि में कर्म और कर्म की प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है।
जब अपनी स्वतंत्र इच्छा के प्रयोग से और अपनी जिज्ञासा के कारण जीवात्मा इस भूमि में प्रवेश करता है - तब से वह इस सीमित संसार का कारक बन जाता है। लेकिन उसकी भागीदारी इस सीमित संसार के प्रारंभ से परे है। इसीलिए उसे अनादी कहा जाता है। अनादी का अर्थ है कि जो इस सीमित संसार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
एक बार भौतिक प्रकृति के संपर्क में आने के बाद, जीव कर्म के अधीन हो जाते हैं - कर्म और उसकी प्रतिक्रिया का नियम। इस नियम के तहत जीवात्मा जीवन की विभिन्न प्रजातियों में सुख एवं दुःख का अनुभव करते हैं। अपनी भौतिक अस्थाई निवास के दौरान, परमात्मा जीवात्मा के साथ होते हैं और देखते हैं की वह कब अपना शीर्ष परम सत्य (भगवान) की ओर घुमाएगा। परमात्मा भटकती जीवात्मा की दिशा निर्देशित करते हैं, और जब कोई सत्य को जानने की इच्छा करता है, तब परमात्मा उस जीव के सामने आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रकट होते हैं, जो उसे श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान यथा रूप देते ह। और इसे प्रकार जीवात्मा जन्म और मृत्यु के इस भव सागर को पार कर लेता है।
ब्रहमाण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान जीव ।
गुरु कृष्ण प्रसादे पाय भक्ति लता बीज ॥
अपने कर्म के अनुसार, जीवात्मा पूरे ब्रह्माण्ड में भटक रहे हैं। कुछ जीवात्मा जो सबसे भाग्यशाली होते हैं, उन्हें गुरु और कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है, और ऐसी कृपा से उन्हें भक्ति के लता का बीज प्राप्त होता है। (चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला १९.१५१)
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