सरल भावार्थ (हिंदी):
भक्ति-योग या कृष्ण-चेतना में पूर्णता, झूठी प्रतिष्ठा एवं माया से मुक्त होने के प्रयास के बिना प्राप्त नहीं होती है। इसे प्राप्त करने के लिए परम-सत्य की खोज में व्यक्ति को समान विचार वाले व्यक्तियों की संगत रखनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, बुरी संगत का त्याग करना चाहिए।
असत् संग त्याग - ए वैष्णव आचार ।
स्त्री सङ्गी एक असाधु कृष्णभक्त आर ॥
एक वैष्णव (भक्ति-योगी) को बुरी संगत से बचे रहना चाहिए - ऐसे लोगों से जो भौतिक रूप से आसक्त होते हैं, जिन्हें अवैध यौनक्रिया का लत होता है, और जो पूर्ण सत्य के ज्ञान के अर्जन में रुचि नहीं रखते हैं। (चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला २२.८७)
श्री कृष्ण का सर्वोच्च निवास भक्ति-योगी का अंतिम गंतव्य होता है और कृष्ण कहते हैं कि उनका निवास सूर्य, चंद्रमा या अग्नि से प्रकाशित नहीं होता। सूर्य, चंद्रमा या अग्नि से प्रकाशित न होने का अर्थ है कि उनका परम धाम भौतिक जगत में मौजूद अंधकार की पहुंच से परे है। कृष्ण के परम धाम में, जो आत्मबोध-युक्त योगियों द्वारा गोलोक वृन्दावन के नाम से जाना जाता है, सब कुछ श्रीकृष्ण की प्रभा से उज्जवलित है।
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम् ।
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ॥
तमेव भान्तमनुभाति सर्वम् ।
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥
वहाँ न तो सूर्य की रोशनी है, न चांद की, न तारों की, न ही वहां बिजली चमकती है। फिर अग्नि कैसे जला सकती है? जब परम पुरुष प्रकाशित होते हैं, तब ये सभी प्रकाशित हो जाते हैं। अपनी प्रभा के माध्यम से ही वे सब कुछ रोशन करते हैं। (कठोपनिषद् २.२.१५)
श्री कृष्ण यह भी कहते हैं कि एक बार उनके परम धाम को प्राप्त करने के बाद, कोई भी इस जन्म और मृत्यु के संसार में वापस नहीं लौटता है। भौतिक दुनिया असीमित दोषों से भरा हुआ है, लेकिन परम धाम अमोघ है। भौतिक जगत के दोषों मे ईर्ष्या, लालच, काम, घृणा, तामसिकता आदि शामिल हैं, लेकिन ये भौतिक गुण कृष्ण के धाम में प्रवेश नहीं कर सकते।
कुछ विचारकों ने यह मान रखा है कि इस भौतिक दुनिया में रहने वाले प्राणी मूल रूप से कृष्ण के परम धाम से अपनी शाश्वत स्थिति से पतित हुए हैं। ऐसे व्यक्तियों को पतन-वादी’ के रूप में जाना जाता है। ‘पतन-वादी’ की सोच के अनुसार, श्री कृष्ण का परम निवास दोष युक्त है और ईर्ष्या, असंतोष, लालच, घृणा आदि के अधीन है। दोष युक्त होने के लिए अज्ञानता, विस्मृति और संदेह आदि होना चाहिए। परन्तु, यह जानते हुए कि परम धाम में कोई भौतिक गुण मौजूद नहीं हैं, इसलिए वहां के मुक्त जीवों के भौतिक गुणों से दूषित होना संभव नहीं है।
श्री कृष्ण कहते हैं कि एक बार उस धाम में जाने के बाद भौतिक संसार में कोई नहीं लौटता (यद्गत्वा न निवर्तन्ते)। श्री कृष्ण यह नहीं कहते कि “फिर से” उस परम निवास पर जाने के बाद कोई कभी नहीं लौटता। इसलिए, कृष्ण के शब्दों से यह समझा जाता है कि कोई भी उनके परम धाम से पतन नहीं करता।
आध्यात्मिक और भौतिक दुनिया के सभी जीव श्रीकृष्ण के अवयवभूत अंश हैं - ममैवांशो जीवलोके जीव-भूत सनातनः। हालांकि, वे जीव जो भौतिक प्रकृति से बद्ध हैं, जिन्हें अपनी इन्द्रियों पर कोई नियंत्रण नहीं है, और परम धाम का कोई ज्ञान नहीं है, वे बारम्बार इस जन्म और मृत्यु के संसार में पुनर्जन्म लेते हैं। मृत्यु के समय वे भौतिक इच्छाओं और मन के द्वारा अपने अगले शरीर में चले जाते हैं, जिस तरह पवन सुगंध को अपने साथ बहा ले जाता है।
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