सरल भावार्थ (हिंदी):
इस अध्याय में श्री कृष्ण अर्जुन के उस प्रश्न का उत्तर देते हैं जो ऐसे लोगों के बारे में है जो वेदों के नियमों का पालन नहीं करते, किंतु श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं। अर्जुन जानना चाहता है कि ये लोग किस प्राकृतिक गुण से नियंत्रित हैं।
यहाँ पर पहली शिक्षा यह दी जाती है कि यदि कोई वैदिक नियमों का अनुसरण नहीं करता तो वास्तव में वह केवल अपनी इच्छा के अनुसार आचरण करता है, हालांकि ऐसा करने से वह भौतिक गुणों (सत्त्वगुण, रजोगुण, और तमोगुण) के अधीन हो जाता है। अतः वह कभी भी पारलौकिक स्तर पर स्थित नहीं माना जाता है। तत्पश्चात श्री कृष्ण आहार, यज्ञ, तपस्या, एवं दान का वर्णन करते हुए बताते हैं कि कैसे ये प्रकृती के तीन गुणों से प्रभावित होते हैं या उनसे जन्म लेते हैं।
सबसे पहले श्रद्धा पर चर्चा की जाती है। श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि व्यक्ति के वर्तमान जीवन में उसके स्वभाव और उसके मन से जुड़े पिछले जन्म के संस्कार के कारण श्रद्धा उत्पन्न होती है। जीवन की सभी गतिविधियां लगभग श्रद्धा पर ही निर्भर होते हैं। एक आस्तिक की श्रद्धा कहती है कि भगवान हैं, और एक नास्तिक की श्रद्धा कहती है की भगवान नहीं हैं। यदि कोई किसी सिद्धान्त का प्रस्ताव करे और फिर यह कह दे कि उसे अपने प्रस्ताव पर ‘श्रद्धा’ नहीं है, तो यह केवल कपट कहलाता है।
श्री कृष्ण कहते हैं कि जब किसी की श्रद्धा सत्त्वगुण में होती है, तब वे देवी-देवताओं, जैसे कि गणेश, शिव, सूर्य, इन्द्र, सरस्वति इत्यादि की पूजा करते हैं। जब किसी की श्रद्धा तमोगुण में होती है, तब वे निसर्गे के सत्व की या पूर्वजों की पूजा करते हैं - इस वर्ग के लोगों में मानवतावादी एवं अनीश्वरवादी भी सम्मिलित हैं। जब किसी की श्रद्धा तमोगुण में होती है, वे भूत-प्रेत की पूजा करते हैं। पूजा के ये सभी प्रकार आज के संसार में प्रचलित हैं।
भारत में, बहुत लोग बड़े बड़े मन्दिर बनाकर एवं यज्ञ सके माध्यम से देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। सुदूर-पूर्वी देशों में, पूर्वजों की पूजा बुद्ध धर्म, शिनो धर्म, और ताओ धर्म के अनुयायियों में अत्यंत ही लोकप्रिय है। इसी प्रकार, यूरोप एवं अमेरिका में, वैज्ञानिकों, राजनेताओं, सैनिकों, फिल्मी सितारों, रोक सितारों आदि जैसेलोगों को सम्मानित करने के लिए बड़े बड़े इमारत खड़े किए जाते हैं। अफ्रीका, तिब्बत, मेक्सिको, और दक्षिण-अमेरिका में, भूत-पिशाच की पूजा लोकप्रिय है। ये सभी पूजाएं भौतिक त्रिगुणों के प्रभाव से ही किए जाते हैं। अतएव, निष्कर्ष यह निकलता है कि वेदों के नियमों की उपेक्षा करने के कारण, देवी-देवताओं, पूर्वजों, प्रसिद्ध व्यक्तित्वों, भूत-प्रेतों इत्यादि की पूजा पारलौकिक स्तर पर नहीं हैं।
भौतिक त्रिगुणों से परे होने का तात्पर्य है वेदों को स्वीकार करना और इस प्रकार विशुद्ध-सत्त्व के पारलौकिक स्तर पर स्थित होना। जब किसी की श्रद्धा विशुद्ध-सत्त्व में स्थित होती है, तब वह श्री कृष्ण की पूजा करता है। यही एक-ईश्वरवाद (यह मानना की केवल एक ही परम भगवान हैं) का सर्वोच्च स्तर है। विशुद्ध-सत्त्व का शिव जी ने इस प्रकार वर्णन किया है -
सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव शब्दितम् ।
यदीयते तत्र पुमानपावृतः ॥
सत्त्वे च तस्मिन् भगवान वासुदेवो ।
ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते ॥
श्री कृष्ण की आराधना विशुद्ध-सत्त्व में स्थित होकर किया जाना चाहिए। विशुद्ध-सत्त्व ऐसी शुद्ध-चेतना का स्तर है जिसमें ‘वासुदेव’ के नाम से विदित परम-सत्य, बिना किसी आच्छादन के व्यक्त होते हैं। (श्रीमद्भागवतम् ४.३.२३)
शुद्ध चेतना के स्तर पर व्यक्ति सर्वोच्चे प्रकार की श्रद्धा, ‘निर्गुण-श्रद्धा’ से निर्देशित होता है, जो भौतिक प्रकृति के गुणों से बिल्कुल ही अदूषित होती है। वेदों का अनुसरण और धर्मनिष्ठ साधुओं की संगत करते हुए कई जन्मों के पश्चात व्यक्ति में सुकृति (पुंजित श्रेय) उत्पन्न होता है। सुकृति व्यक्ति को साधु-संग (आत्मबोध युक्त योगियों) की ओर ले जाता है, और इस प्रकार साधुओं के मार्गदर्शन से निर्गुण-श्रद्धा का विकास विभिन्न स्तरों के माध्यम से होता है, और अंततः आत्म-साक्षात्कार के सर्वोच्च स्तर - प्रेम-भक्ति तक पहुंचाता है।
निर्गुण-श्रद्धा एक भक्ति-योगी के हृदय में उदय होती है और उसे पारलौकिक अधोक्षज क्षेत्र में परम सत्य को देखने, सुनने, एवं अनुभव करने में सक्षम बनाती है। निर्गुण-श्रद्धा वह है जो श्री कृष्ण की अनुभूति कराती है, उसी तरह जैसे कि एक बिजली की चमक रात के अंधेरे में सावन के बादलों के आकार को व्यक्त करती है। रात के अंधेरे में बादलों को देखा नहीं जा सकता, लेकिन जब बिजली चमकती है, बादलों का आकार दिखाई देता है। उसी तरह, जब निर्गुण-श्रद्धा योगी के हृदय में उदय होती है, तब वे सौन्दर्य के उस अनुपम रूप को देख पाते हैं, जो श्री कृष्ण का स्वयं रूप है।
निर्गुण-श्रद्धा से मार्गदर्शन प्राप्त भक्ति-योगी अनुभव करते हैं कि वे श्री कृष्ण के लिए ही बने हैं, कि वे उनसे स्वतंत्र नहीं हैं। गुणातीत परम पुरुष को समझने की प्रक्रिया कुछ ऐसी होती है कि व्यक्ति को लगना चाहिए कि वह पूर्ण रूप से श्री कृष्ण पर निर्भर है।
श्री कृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति काम, महत्त्वाकांक्षा, सत्ता, दंभ एवं अहंकार द्वारा प्रभावित होते हैं, प्रायः वे ऐसी घोर तपस्याएं करते हैं जो वेदों में या भक्ति-योग के विधियों में निर्धारित नहीं होती हैं - ऐसी तपस्याएं शरीर के इन्द्रियों को शुष्क बना देती हैं। इन तपस्याओं में सम्मिलित हैं - दीर्घकालीन उपवास, अपने शरीर पर स्वयं कोड़े मारना, अपने आप को सूली पर चढ़ाना, रोमच्छद बढ़़िए पहनना, शरीर के अंगों को छेदना, तप्त कोयले पर नंगे पैर चलना इत्यादि। चूंकि ये तपस्याएं तमोगुण में किए जाते हैं, ये अंतर्स्थि त परमात्मा की अवहेलना करते हैं, और इसलिए इनसे कोई अच्छा परिणाम प्राप्त नहीं होता। श्री कृष्ण कहते हैं कि ऐसी तपस्या करने वाले असुर हैं।
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