॥ अनुवृत्ति ॥
Anuvratti (18.41 - 18.44)
सरल भावार्थ (हिंदी):
यहाँ ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों की सामाजिक स्थिति उनके कर्मों के गुणों के अनुसार वर्णित है। ये जीवन की चार सामाजिक व्यवस्थाएं हैं और ये संसार की सभी सभ्य संस्कृतियों में उपस्थित हैं। हर जगह हमें वे लोग मिलते हैं जो बुद्धिजीवी वर्ग - ब्राह्मणों के सदृश हैं। हर जगह वे मिलते हैं जो क्षत्रियों यानि प्रशासकों और योद्धाओं के सदृश हैं, हर जगह हमें व्यापारी और श्रमिक वर्ग, वैश्य और शूद्र भी मिलते हैं। यह समाज का स्वाभाविक विभाजन है और यह उनके कर्मों के लक्षणों से निर्धारित होते हैं।
दुर्भाग्यवश, आधुनिक भारत में, श्रीकृष्ण द्वारा भगवद्गीता में वर्णित यह सामाजिक प्रणाली भ्रष्ट हो चूकी है और अब यह जाति व्यवस्था के रूप में जानी जाती है जो जन्म के आधार पर एक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करती है। जाति-व्यवस्था दरअसल भगवद्गीता में वर्णित सामाजिक व्यवस्था नहीं है जिसे वर्णाश्रम-धर्म के नाम से जाना जाता है।
भारत में जाति व्यवस्था निश्चित रूप से शोचनीय है, यह लगभग गुलामी ही है, क्योंकि यह व्यक्ति की क्षमता को उसके जन्म के आधार पर सीमित कर देती है। भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि एक व्यक्ति को उसके कर्मों से जानना चाहिए न की उसके वंश से।
यद्यपि दुनिया भर में बुद्धिजीवी, प्रशासक, व्यापारी और श्रमिक वर्ग वाले सामाजिक पद्धति पाई जाती हैं, लेकिन वे फिर भी भगवद्गीता में वर्णित वर्णाश्रम व्यवस्था के समान नहीं हैं। एक बुद्धिजीवी होने के अलावा, एक ब्राह्मण को यह पता होना चाहिए कि ब्रह्मन (ब्रह्म-ज्योति) क्या होता है।
एक क्षत्रिय के केवल प्रशासन और युद्ध के अलावा अन्य कर्त्तव्य भी होते हैं - उसे भ्रष्टता से ऊपर होना चाहिए, लोगों को सुरक्षा देनी चाहिए और भगवद्गीता में पाए गए धर्म के सिद्धांतों की रक्षा करनी चाहिए। और सबसे बढ़कर, एक क्षत्रिय को कभी भी आक्रामक नहीं होना चाहिए - उसे कभी भी एक संप्रभु देश पर आक्रमण नहीं करना चाहिए।
वैश्य का कर्त्तव्य, व्यवसाय के अलावा, खेती और गौ-रक्षा है। स्वाभाविक रूप से व्यापार का उद्देश्य जीविका के लिए उपार्जन करना है, लेकिन आज यह भगवद्गीता की सलाह के अनुसार वास्तविक आवश्यकता से बहुत आगे निकल चुकी है। सरल व्यवसाय बड़े पैमाने पर उद्योग में बदल गई है - वृहद बहु-राष्ट्रीय कंपनियों की स्थापना, धन की जमाखोरी और आंशिक बैंकिंग (Fractional Banking)। यह सब आज दुनिया भर में सरकारी अधिकारियों को भ्रष्टाचार की और ले जाती है और अंततः इसके द्वारा पर्यावरण का विनाश, गरीबी में वृद्धि और युद्ध होते हैं।
गौ-रक्षा (कृषि-गोरक्षा) का उल्लेख विशेष रूप से श्लोक ४४ में किया गया है क्योंकि सभी पशुओं में से गाय ही है जो मनुष्य के अस्तित्व के लिए सबसे आवश्यक पशु है। मानव शरीर पशु के वसा पर फलता-फूलता है और गाय वह पशु है जो मनुष्य को सबसे अधिक दूध, दही, मक्खन, पनीर इत्यादि प्रदान करती है। दूध और दूध के उत्पाद, जब उपयुक्त मात्रा में लिए जाते हैं, तो यह मनुष्य के स्वस्थ जीवन के लिए सभी आवश्यक वसा प्रदान करते हैं, इस प्रकार पशु-वध रोका जाता है। दूसरे शब्दों में, पशुओं को मारना और वसा प्राप्त करने के लिए उनका मांस खाना आवश्यक नहीं है। जब गायों की रक्षा होती है, तब सभी के लिए पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ आहार के लिए दूध उपलब्ध होता है।
मानव समाज के लिए गाय का मूल्य निर्विवाद है और इसलिए वैदिक संस्कृति में गाय को सात प्राकृतिक माताओं में से एक माना जाता है। ये सात माताएं इस प्रकार हैं:
आत्म-माता गुरोः पत्नी ब्राह्मणी राज-पत्नि का ।
धेनुर्धात्री तथा पृथ्वी सप्तैता मातरः स्मृताः ॥
अपनी माता, गुरु की पत्नी, एक ब्राह्मण की पत्नी, राजा की पत्नी, गाय, धात्री और पृथ्वी - इन सातों को हमारी माताएं मानी जानी चाहिए। (चाणक्य नीति-शास्त्र ५.२३)
दुर्भाग्यवश, व्यवसाय समुदाय के लोग, स्वास्थ्य और समृद्धि के नाम आज कॉर्पोरेट खेती और गायों एवं अन्य पशुओं के सामूहिक-वध के व्यवसाय में लग गए हैं। वास्तव में, लोगों ने अपनी भूमि खो दी है और परिवार के खेत जो कभी समाजों की रीढ़ होती थी, आज कही भी उपस्थित नहीं हैं। औद्योगिक खेती ने जैविक उर्वरकों को रासायनिक उर्वरकों के साथ बदल दिया है, जो मिट्टी को बेजान बनाते हैं और ऐसे आहार का उत्पादन करते हैं जो पौष्टिकता में कम और विषाक्त सामग्री में उच्च होते हैं। वधशाला से निकला मांस भी विषाक्त होता है एवं शाकाहारी भोजन की तुलना में बहुत कम स्वस्थ होता है।
दुनिया भर में समाज, वैश्यों के लौटने के लिए रो रहे हैं, लेकिन सरकारें बहरों और अंधों की तरह कान और आँख मूंद कर बैठे हैं, और खाद्य श्रृंखला के सबसे आखिर में आनेवाले शूद्र, मजदूर वर्ग इस परिस्थिति से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। परन्तु, परिवर्तन दूर नहीं, क्योंकि दुनिया भर में लोग अब अपने इस बुरे सपने से जाग रहे हैं जो उनकी असलीयत बन चुकी है, और अब वे इन समस्याओं के उचित समाधानों को खोज रहे हैं। ऐसे ईमानदार व्यक्तियों के लिए, भगवद्गीता अंतर्दृष्टि और मार्गदर्शन प्रदान करता है।
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