सरल भावार्थ (हिंदी):
यहां, द्वितीय अध्याय से ही भगवद्गीता वस्तुतः प्रारंभ होती है। भगवद्गीता का यथाशब्द अर्थ है भगवान् का गीत' और भगवान् का अर्थ है परम सत्य।
भगवद्गीता में यहां पर पहली बार श्री कृष्ण को भगवान् कहकर संबोधित किया जाता है। पराशर मुनि जैसे वैदिक विद्वानों के अनुसार भगवान् वे हैं जो संपूर्ण ऐश्वर्य, वीर्य, यश, सौंदर्य, ज्ञान, व वैराग्य के स्वामी हैं।
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीङ्गणः ॥
भगवान् वे हैं जिनमें ऐश्वर्य, वीर्य, यश, सौंदर्य, ज्ञान, व वैराग्य के लक्षण संपूर्णता में पाए जाते हैं। (विष्णु पुराण ६.५.४७)
इसके अलावा, सोलहवें शताब्दी के वैष्णव तत्त्वज्ञ जीव गोस्वामी कहते हैं कि भगवान् हैं भजनीय गुण च अनन्त च नित्यः' - वे जो सर्व-पूजनीय गुणों के स्वामी हैं, और जिनका सर्वाकर्षणी स्वभाव ऐसा है कि वे हमारा स्नेह व श्रद्धाभाव अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
आधुनिक समाज में भगवान् के अस्तित्व में होने न होने के विषय पर बहुत चर्चा होती है। भगवान् का अस्तित्व निश्चित करने से पहले यह परिभाषित करना आवश्यक है कि 'भगवान्' शब्द का अर्थ क्या है। तदनुसार, प्राचीन भारत के सत्यान्वेषी ऋषियों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि भगवान् वास्तव में हैं तो वे समस्त संसार के स्वामी व अधिकारी होंगे, सर्वशक्तिमान होंगे, सबसे प्रसिद्ध होंगे, सबसे सुंदर होंगे, सर्वज्ञ होंगे, और साथ-साथ वे अनासक्त या त्यागी भी होंगे। सूक्ष्म विश्लेषण के पश्चात उन सत्यान्वेषी ऋषियों ने निश्चित किया है कि केवल श्री कृष्ण ही वस्तुता के परम स्त्रोत या परम सत्य हो सकते हैं, और दरसल वे ही हैं। इस विष्कर्ष परिणाम की अनेक संतों ने युगो-युगो से (१०,००० बीसी पूर्व से) पुष्टि की है और वैदिक शास्त्रों में, जैसे कि उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत, वेदान्त सूत्र, श्रीमद्भागवतम् और ब्रह्म-संहिता आदि शास्त्रों में इसकी व्यापक रूप से व्याख्या की गई है।
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः ।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्व कारण कारणम् ॥
कृष्ण परमेश्वर हैं। उनका रूप सत् चित् एवं आनन्द से बना है। वे समस्त अस्तित्व के स्त्रोत हैं। वे गौ और इन्द्रियों के स्वामी हैं। उनका कोई अन्य स्रोत नहीं है और वे स्वयं ही सभी कारणों के मूल कारण हैं। (ब्रह्म-संहिता ५.१)
एते चांश कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।
इन्द्रारि व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥
भगवान् के विभिन्न अवतार या तो उनकी पूर्णविभूति के अंश हैं या उनकी पूर्णविभूति के अंशों के अंग हैं। परन्तु कृष्ण इन सभी अवतारों के मूलस्रोत हैं। जब अमंगलकारी शक्तियां भगवान् के भक्तों को व्याकुल करती हैं तब वे उनकी रक्षा हेतु प्रत्येक युग में प्रकट होते हैं। (श्रीमद्भागवतम् १.३.२८)
हरिरेव सदाराध्यम् सर्वदेवेश्वरेश्वरम् ।
इतरे ब्रह्म-रुद्राद्य नवजेयम् कदाचन ॥
संपूर्ण जगत के स्वामी के रूप में केवल श्री हरि (कृष्ण) ही आराध्य हैं। ब्रह्म, शिव और अन्य सभी देवी-देवताएं कभी भी इस नियम का उल्लंघन नहीं करते। (पद्म-पुराण)
यत्रावतीर्ण कृष्णाख्यम् परब्रह्मानराकृतिम् ।
जब परम पुरुष अपने मनुष्य सदृश रूप में अवतीर्ण होते हैं, वे परब्रह्म कृष्ण हैं। (विष्णु पुराण ४.११.२)
तस्मात् कृष्ण एव परो देवस्तं ध्यायेत् तं रसेत् तं भजेत् तं यजेत् ।
अतः कृष्ण ही परम पुरुष हैं। उनका ध्यान करें। उनका ही आनंद लें। उनकी आराधना करें व उन के लिए भोग चढ़ाएं। (गोपाल-तापनी उपनिषद् १.५४)
कृषि वाचकः शब्दो णश्च निर्वृति वाचकः ।
तयोरैक्यं परंब्रह्म कृष्ण इत्यभिदीयते ॥
'कृष' शब्दांश कृष्ण के सर्वाकर्षी लक्षण को सूचित करता है और 'ण' उनके दिव्य आनंद को। जब 'कृष' शब्दांश को 'ण' से जोड़ा जाता है, तब 'कृष्ण' शब्द बनता है जो परम सत्य को सूचित करता है।
रणभूमि में कुछ ही समय में वीरगती प्राप्त करने वालों के प्रति अर्जुन करुणामय हो गए हैं। वस्तुतः उनका दुःख इतना ज्यादा है कि वे अपने शत्रुओं का वध करने के बजाय स्वयं अपने प्राण देने के लिए तैयार हैं। किंतु अर्जुन एक कुलीन क्षत्रीय है और इसी कारण कृष्ण उन्हें अपने हृदय की दुर्बलता को त्याग करने की सलाह देते हैं। यदि कोई क्षत्रीय है तो शत्रु का सामना करना उसका कर्तव्य है ना की पीछे हटकर दुबक जाना। युद्ध करना अवश्य एक दुःखदायक परिस्थिति है, किंतु जब धर्म का अनुसरण करना होता है तब युद्ध अनिवार्य हो जाता है। प्राचीन काल में आक्रामकता घृणाजनक थी और समाज में एवं देशों के बीच वह बिलकुल ही वर्जित हुआ करता था। किंतु जब अतिक्रमण होता तब प्रतिकार या युद्ध स्वीकार्य था। महर्षी वसिष्ठ के अनुसार छः प्रकार के अतिक्रामक होते हैं और मनु-संहित के अनुसार इनका सामना एक घातक प्रतिकार से होना चाहिए।
अग्निदो गरड़श्चैव शस्त्र-पाणिर्धनापहः ।
क्षेत्र-दारापहारी च षडेते ह्याततायिनः ॥
घर में आग लगानेवाला, विष घोलनेवाला, घातक शस्त्रों से हमला करनेवाला, राज्य की संपत्ति हड़पनेवाला, आक्रमण कर राज्य पर कब्जा करनेवाला, और परिवार के सदस्यों का अपहरण करनेवाला - इन सभी को आक्रमणकारी समझा जा सकता है। (वसिष्ठ-स्मृति ३.१९)
आततायिनमायान्तम् हन्यादेवाविचारयन् ।
नाततायिवधेदोषो हन्तुर्भवति कश्चन ॥
बिना हिचकिचाहट के एक क्षत्रीय को अतिक्रामकों का वध करना चाहिए, क्योंकि उनकी हत्या से पाप नहीं होता है। (मनु-संहित ८.३५०)
ये सभी श्लोक सामाजिक सिद्धांत (अर्थ-शास्त्र) में दिए गए नियमों के अनुसार हैं। तथापि, धार्मिक सिद्धांत (धर्म-शास्त्र), जिसे अर्थ-शास्त्र से ऊँचा माना जाता है, वह कहता है कि कभी किसी प्राणी को क्षति नहीं पहुंचाना चाहिए (मा हिंसयत् सर्वभूतानि) - तो फिर परिवार के सदस्यों या बुजुर्गों का क्या कहना? ।
अर्जुन की यही दुविधा थी। कृष्ण का कोमल-हृदयी भक्त होने के कारण, अर्जुन अपने परिजनों के विरुद्ध शस्त्र उठाने से विमुख हो गए थे, किंतु एक क्षत्रिय होने के कारण वे नियति का सामना करने के लिए मजबूर भी थे। इस दुविधा की दशा में अर्जुन ने कृष्ण से अपने सखा होने के नैमित्तिक संबंध को टाल कर उन्हें अपना गुरु मान लिया।
वैदिक ज्ञान के अनुसार, अनगिनत ग्रहो एवं समांतर ब्रह्माण्ड अस्तित्व में है जहां पर जीवन पाया जा सकता है। इनमें से कुछ ग्रहों व ब्रह्माण्डों में जीवनस्तर, पृथ्वी पर हमारे जीवनस्तर से उच्च हैं, तो कुछ में पृथ्वी से निम्न। यदि कोई अपने जीवनकाल में अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करता है तो तदनुसार वह उच्च लोकों में जन्म की ओर प्रस्थान करता है। लेकिन यदि वह अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता है तो अगले जन्म में केवल कलंक एवं निचले लोकों में निम्नगमन उसकी प्रतीक्षा करते हैं।
अर्जुन के द्वारा अपने निर्धारित वैदिक कर्तव्यों का नहीं पालन करने के कारण कृष्ण 'अनार्य' शब्द का प्रयोग करते हैं जिसका अर्थ है आर्य नहीं होना। आर्यन कौन हैं और वे कहाँ से आए हैं, इस बात पर सदियों से बहस चलती आ रही है। इस तरह की अधिकांश विवेचनाएं शारीरिक उपाधियों पर निर्धारित होती हैं और एक जाति के लोगों को दूसरे से श्रेष्ठतर सिद्ध करने के लिए की जाती हैं। परन्तु भगवद्गीता में, श्री कृष्ण के वचनानुसार, आर्यन वे हैं जो वैदिक निर्देशों के अनुसार अपने धर्मों का पालन करते हैं। अतएव यह समझा जा सकता है कि आर्यन शब्द कोई विशेष जाति के लोगों से नहीं बल्कि एक जीवन जीने की कला से, एक जीवनशैली से संबंधित है।
परमात्मा और आत्मा के सनातन अस्तित्व का ज्ञान ही समस्त वैदिक प्रज्ञता की कुंजी है। इस अध्याय में, अर्जुन के लिए कृष्ण के उपदेशों का यही केंद्रीय विषय है।
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