सरल भावार्थ (हिंदी):
दसवें श्लोक में ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा गया है। वेदों के अनुसार, संसार में ब्रह्मा ही सर्वप्रथम जीव हैं जो सीधे विष्णु से प्रकट होते हैं। ब्रह्मा का प्रकार्य ग्रह-मंण्डलों के दूसरे दरजे के सृष्टा के रूप में है। आधुनिक समय में, कुछ नास्तिक विचारक, जैसे कि आक्स्फर्ड विश्वविद्यालय के क्रमविकासीय जीवविज्ञानी रिचार्ड डौकिन्स ने स्वीकार किया है कि संभवतः किसी परग्रहियों ने ही धरती पर जीवन का बीज बोया है। हम में से कुछ लोगों के लिए यह बात कोरी कल्पना सुनाई दे सकती है, किंतु यह विचार निस्संदेह सत्य के बहुत निकट
भारत के प्राचीन शास्त्र कहते हैं कि ब्रह्मदेव जग के सर्वोच्च लोक में रहते हैं जिसे सत्यलोक कहा जाता है। फिर ब्रह्मदेव के कुछ पुत्रों को, जिन्हें प्रजापति कहा जाता है, उन्हें ब्रह्मांड में हर जगह जीवन को आरंभ करने के लिए भेजा गया। परन्तु ब्रह्मदेव को एक परग्रही मानने के बजाय वैदिक शास्त्र उन्हें ब्रह्मांड के सभी जीव-जन्तुओं के पिता के रूप में दर्शाते हैं।
जबसे पश्चिमी सभ्यता वैदिक देव समूह के संपर्क में आई है तब से यह अनुमान जारी है कि वैदिक जनसमूह, जिन्हें अक्सर हिंदू कहा जाता है, वे 'पैगन' हैं - पैगन वे लोग होते हैं जो अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, किसी एक परम भगवान् की नहीं। इस प्रकार पश्चिमी अवेक्षक इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि एक-ईश्वरवाद का जन्म पश्चिम के अब्राहमिक धर्मों में ही हुआ था। किंतु यह बात सत्य नहीं।
वैदिक देव-समूह में अवश्य अनेक लघुतर देव हैं, किंतु वैदिक शास्त्र इस बात पर स्पष्ट हैं कि केवल एक ही परम-पुरुष या परम-प्रज्ञा है जो सबसे ऊपर है। उसे ब्रह्मन, परमात्मा, भगवान्, विष्णु या कृष्ण कहकर संबोधित किया जाता है। जैसा की ऋग्वेद (१.२२.२०) में कहा गया है -
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः दिवीव चक्षुराततम् ।
विष्णु के दिव्य चरण सबके उपर उसी प्रकार विद्यमान हैं, जिस तरह सूर्य सबके सिर के उपर होता है। विष्णुजी के पावन चरण हमारे सिर के उपर एक वैभवशाली संरक्षक के सूर्य-समान चौकन्ने आँखों कि भांति है।
श्रीमद्भागवतम् कहता है -
एते चांश कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।
विभिन्न अवतार, या तो भगवान् के विस्तृत प्रभाव हैं या उनके विस्तृत प्रभावों के अंश हैं। किंतु श्री कृष्ण इन अवतारों के मूलस्रोत हैं। (श्रीमद्भागवतम् १.३.२८)
ऐतिहासिक तौर पर, यह मान लेना अनुचित है कि एक-ईश्वरवाद का विकास अब्राहमिक सभ्यताओं में किसी भी बाहरी प्रभाव के बिना हुई थी। असल में, ५०० ईसापूर्व में राजा साइरस के बेबीलोन व यहूदिया प्रांत पर विजय के पश्चात, अब्राहमिक धर्मों ने एक-ईश्वरवाद के विचार को फारसियों से ग्रहण किया। फारसियों के आगमन से पहले से लेकर दूसरे व तीसरे शतकों तक, जाना जाता था कि यहूदीवाद व ईसाईधर्म की मान्यताएं एक या अनेक देवताओं पर आधारित हैं। अतः, एकेश्वरवाद का अब्राहमिक धर्मों में क्रमशः विकास हुआ। चूंकि वेदों में पाए गए एकेश्वरवाद की अवधारणा अब्राहमिक धर्मों से बहुत प्राचीन है, यह निष्कर्ष तर्कसंगत है कि अब्राहमिक धर्मों ने वैदिक धर्मों से ही इस विचार का ग्रहण किया है। अंतराल में, जोरास्टर के प्रभाव से, फारसियों ने भारत से एकेश्वरवाद के विचार को अपनाया और उसे मध्य-पूर्वी सभ्यताओं में प्रेषित किया। वाकई, एक-ईश्वरवाद सदैव भारतीय वैदिक शास्त्रों का केन्द्रीय विषय रहा है।
परन्तु, वेदों के तत्वज्ञान को गम्भीरता से समझने में नाकामी या संभवतः पश्चिमी विचार व धर्मों के मुकाबले वैदिक ज्ञान की श्रेष्ठता के कारण, सांस्कृतिक रूप से अभित्रस्त होकर, यूरोकेन्द्रित विद्वानो और रूढ़िवादी धार्मिकों ने भारतीय वैदिक सभ्यता को अधिकारहीन बना दिया है। जर्मन विद्वान मैक्स म्यूलर ने १९ वी सदी में, आर्य-आक्रमणवाद की सृष्टि के द्वारा इस विषय पर और अधिक गलत सूचना का प्रचार किया, यह कहकर की वैदिक सभ्यता का जन्म भारत में नहीं हुआ। किंतु ये सब सत्य से काफी दूर हैं। म्यूलर के अनुसार आर्यन एक यूरोपीय खानाबदोश जनजाति थे जिन्होने भारत पर आक्रमण किया। परन्तु इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि आर्यन खानाबदोश थे। दरसल, यह सुझाव कि एक असभ्य खानाबदोश आदिवासियों ने वेदों जैसे गहन ज्ञान से परिपूर्ण शास्त्रों की रचना की होगी, इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
और तो और, वेदों में किसी मातृभूमी का भी कोई उल्लेख नहीं है, और पुरातात्त्विकी अन्वेषणों में भी प्रमाणों के पूरे अभाव के कारण यह भी कहा नहीं जा सकता कि कोई आक्रमण कभी हुआ था। अतः, केवल यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आर्यन जनसमूह और वैदिक विद्या सदैव भारतीय ही रहे हैं।
वैदिक ज्ञान कहता है कि विष्णु / कृष्ण ही परम भगवान् हैं और अन्य लघुतर देवी-देवताएं जैसे कि ब्रह्मा, शिव, गणेश, कार्तिकेय, काली, सरस्वती आदि, वस्तुतः परमपुरुष के सेवक हैं और उन्हें प्रकृति के लौकिक प्रशासन की व्यवस्था संबंधी कर्तव्यों को करने के लिए सशक्त किया गया है। उपर्युक्त श्लोकों में श्री कृष्ण, देवताओं के प्रति भोग-अर्पण करने की संस्तुति करते हैं, इस प्रकार देवताएं प्रसन्न होते हैं और मानवजाती के जीवन की सभी आवश्यकताओं को वे पूरा करते हैं। संक्षेप में, यही लौकिक कर (टैक्स) की प्रणाली है। दूसरे शब्दों में, हमें देवताओं का शुल्क चुकाना चाहिए।
आत्मा का भी अंतर्भूत स्वभाव सेवा व त्याग ही होता है। वैधानिक रूप से आत्मा, जो अवयव समष्टि (परम-सत्य) का अंश है, वह इस जन्म में तो क्या, वह अनन्तकाल के लिए समष्टि की सेवा करने के लिए कर्तव्य बद्ध है। जब श्री कृष्ण (विष्णु) को शाकाहारी व्यंजन जो कि फल, सब्जी इत्यादि से बना होता है, उसके बाद ऐसे प्रसाद को ग्रहण करने से हमारे इन्द्रियां शुद्ध होती हैं। परन्तु यदि कोई संसार के स्वामी के प्रति आभार प्रकट किए बिना ही इस संसार की वस्तुओं का उपभोग करता है तो वह केवल कर्म की प्रतिक्रिया का फल भोगना पड़ता है। यह नियम हमारे दैनिक आहार पर भी लागू होता है, जिसे खाने से पहले उसे विष्णु या कृष्ण को अर्पित करना चाहिए। भगवद्गीता में आगे श्री कृष्ण द्वारा यह समझाया जाता है कि भगवान् के भोग में केवल सब्जी, फल, दूध के उतपाद, एवं फूल आदि ही चढ़ाए जा सकते हैं। मांसाहारी भोजन विष्णु या कृष्ण को अर्पित नहीं किया जा सकता - इसलिए विष्णु या कृष्ण के सभी भक्त शाकाहारी होते हैं। कृष्ण यह भी समझाते हैं कि जो परम-सत्य (भगवान्) की सेवा करते हैं वे अन्य देवी-देवताओं की सेवा करने के लिए बाध्य नहीं होते हैं, और न कोई सामाजिक नियमों के अधीन होते हैं।
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