सरल भावार्थ (हिंदी):
जो श्री कृष्ण के आविर्भाव व कर्मों को समझते हैं वे निश्चय ही जन्म और मृत्यु के चक्र से परे स्थित हो जाते हैं। भौतिक जीवन में सभी जीवात्माएं, एक जन्म से दूसरे जन्म में शरीर के निरंतर देहांतरण की अवस्था में रहते हैं। जब कोई शुद्ध आध्यात्मिक चेतना की अवस्था प्राप्त कर लेता है तब वह संसार व देहांतरण की प्रक्रिया से मुक्त हो जाता है। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हम दोनों ही कई जन्मों से गुज़र चुके हैं, जिन्हें तुम (अर्जुन) तो भूल चुके हो, किंतु मुझे (कृष्ण) उन सब जन्मों का स्मरण है।
चूंकि जीवात्माएं मृत्य के समय अपना शरीर बदलती हैं, इसलिए वे अपने पिछले जन्मों को भूल जाते हैं। श्री कृष्ण ही परम-सत्य हैं, और इसलिए वे कभी भी अपना शरीर नहीं बदलते। चूंकि कृष्ण अपना शरीर नहीं बदलते इसलिए वे कुछ भी नहीं भूलते। श्री कृष्ण और उनके शरीर में कोई अन्तर नहीं, जब कि जीवात्माएं भौतिक जीवन में भौतिक पदार्थों से देहबद्ध होती हैं। भौतिक संसार में सभी जीवात्माओं के शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, और अहंकार जैसे मूलभूत पदार्थों से निर्मित होते हैं। भगवान् श्री कृष्ण का स्वरुप सच्चिदानन्द (सत-चित-आनन्द) है। कृष्ण का स्वरूप सच्चिदानन्द है, अतः कृष्ण और उनके स्वरूप में कोई अन्तर नहीं। वे दिव्य एवं आध्यात्मिक हैं।
श्री कृष्ण को न केवल अपने सभी जन्मों का स्मरण है, परन्तु उन्हें अर्जुन के भी पिछले सभी जन्मों का स्मरण है। जो पूर्ण रूप से सर्वज्ञ हैं, यही परम-सत्य के लक्षण हैं।
योगविद्या के विलुप्त हो जाने पर धर्म का पतन और अधर्म का उत्थान स्वाभाविक है। श्री कृष्ण कहते हैं कि जब ऐसा होता है, तब वे इस दुनिया में धर्म की पुनर्स्थापना करने केलिए प्रकट होते हैं। ऐसे कर्तव्यों, कार्यों, तथा अभ्यासों को धर्म कहा जाता है जो लोगों को कुशल-मंगल बनाए रखे और उन्हें उनकी सृष्टिपरक वैधानिक स्थिति को जानने में उनकी सहायता करे जिससे कि वे यह समझ सके कि वे परम-सत्य श्री कृष्ण के ही सचेत अवयवभूत अंश हैं। इस दुनिया के सांसारिक आस्थाओं (Religions) को धर्म मान लेना गलत है।
आठवे श्लोक में कृष्ण कहते हैं कि वे प्रत्येक युग में (युगे युगे) युगधर्म की स्थापना करने प्रकट होते हैं। सत्ययुग में श्री कृष्ण हंस, मत्स्य, कूर्म, वराह, और नृसिंह अवतार में प्रकट हुए। त्रेतायुग में वे वामन, परशुराम, और रामचन्द्र बनकर आए। द्वापरयुग में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण पधारे, और कलियुग में वे बुद्ध और श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में आए। एक और अवतार हैं जो आज से लगभग ४,२७,००० वर्ष पश्चात, कलियुग के अंत में आनेवाले हैं, वे हैं कल्कि ।
जब कृष्ण भगवद्गीता का ज्ञान दे रहे थे, तब द्वापरयुग का अंत हो रहा था - ऐसा युग जहां बहुत धर्मनिष्ठता हुआ करती थी और मद्यपान की दुकानें, अवैध यौन-क्रिया, राजनैतिक भ्रष्टाचार, नशीली पदार्थों का दुष्प्रयोग, और गठित रूप में पशु संहार जैसी बुराईयों का खुलेआम प्रचलन तब बिल्कुल ही अनसुना हुआ करता था। आज, पाँच हजार वर्ष पश्चात, हम एक ऐसे युग में हैं जिसे कलियुग कहा जाता है, जहां पर ऐसी बुराईयां सामान्य तौर पर सब जगह देखी जाती है जो द्वापरयुग में अनसुनी हुआ करती थी।
जिस प्रकार श्री कृष्ण द्वापरयुग के अंत में प्रकट हुए थे, उसी तरह पुनः कलियुग में, ४५७६ वर्ष पश्चात वे श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए। श्री चैतन्य महाप्रभु को कलियुग के अवतार या युगावतार भी कहा जाता है। युगावतार के रूप में, श्री कृष्ण ने नाम-संकीर्तन के धर्म की शिक्षा दी, जिसे महामन्त्र का कीर्तन कहते हैं, और जो न केवल आत्म-साक्षात्कार केलिए सबसे महत्वपूर्ण साधन है, परन्तु कलियुग में आत्म-साक्षात्कार केलिए इसे इकलौता अनुशंसित साधन माना गया है। बृहन्नारदीय पुराण (३८.१२६) में इस बात को निर्णायक ढंग से कहा गया है -
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥
कलियुग में हरिनाम के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं, अन्य कोई उपाय नहीं, अन्य कोई उपाय नहीं।
जब महामन्त्र को सामूहिक तौर पर उच्च स्वर में गाया जाता है, तब उसे कीर्तन या संकीर्तन कहते हैं। जब महामन्त्र का मंद स्वर में उच्चारण करते हुए, एक-सौ-आठ मणियों की माला पर उनके आवर्तन गिने जाते हैं, तब उसे जाप कहते हैं।
श्री चैतन्य महाप्रभु तथा संकीर्तन आन्दोलन के आविर्भाव के पश्चात, सार्वभौम भट्टाचार्य और प्रकाशानन्द सरस्वती जैसे अनेक महान व विद्वान पण्डितों ने, तत्त्वज्ञानियों ने, एवं योगियों ने, सभी योग, वेदान्त व दर्शन प्रणालियों को एक तरफ रखकर, कृष्ण के पवित्र नामों के जाप में स्वयं को पूरी तरह से निमग्न कर लिया है। महान परमहंसों के अनुसार, इस युग में आध्यात्मिक परिपूर्णता प्राप्त करने केलिए, महामन्त्र का कीर्तन ही सबसे पक्का रास्ता है। श्रीमद्भागवतम् में कहा गया है -
कलेर् दोष-निधे राजन् अस्ति ह्येको महान् गुणः।
कीर्तनाद् एव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् ॥
हाला कि कलियुग अनेक दोषों से भरा एक महासागर है, जहां पर लोग अल्पायु, मंद और सदैव अशांत होते हैं, फिर भी इस युग की एक महान विशेषता यह है कि केवल श्री कृष्ण का नाम जपने से ही व्यक्ति अपने सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो सकता है और परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। (श्रीमद्भागवतम् १२.३.५१)
कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः ।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरि कीर्तनात् ॥
सत्ययुग में विष्णु पर तपस्या करने से, त्रेतायुग में विस्तारपूर्वक यज्ञ कार्य करने से, तथा द्वापरयुग में भगवान की श्री मूर्ती के अर्चन से, जो परिणाम पाए जाते थे, कलियुग में महज़ श्री कृष्ण के नाम-संकीर्तन द्वारा वही परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। (श्रीमद्भागवतम् १२.३.५२)
महामन्त्र का जाप हमें आत्म-साक्षात्कार के पथ पर आगे बढ़ाता है, क्योंकि यह हमारे हृदय से सांसारिक वासनाओं को मिटाकर उसे निर्मल बनाता है, यह हमारे जीवन की मिथ्या धारणाओं का सफाया करता है, और इस प्रकार यह हमें जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ती प्रदान करता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक श्लोक की रचना की है जहां पर उन्होंने संकीर्तन या महामन्त्र के जाप से प्राप्त होने वाले लाभों को इस प्रकार बताया गया है -
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणं
श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम् ।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनं
सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम् ॥
कृष्ण का पवित्र नाम हृदय के दर्पण को स्वच्छ बनाता है, और जन्म और मृत्यु के सांसारिक जंगल की क्लेशाग्नि को बुझाता है। जिस तरह ब्रह्मकमल, चन्द्रमा की शीतल किरणों में खिलता है, उसी तरह हमारा हृदय भी कृष्ण के नामामृत में फूलने लगता है। अंत में आत्मा को अपने सच्चे आंतरिक निधी की जागरूकता, यानी कि कृष्ण के संग एक प्रेमपूर्वक जीवन बिताने की जागरूकता उसे होने लगती है। पुनः पुनः अमृत का आस्वादन करते हुए, आत्मा एक निरंतर बढ़ती हुई आनन्दातिरेक के सागर में पुनः पुनः डुबकि लगाती है और सतह पर आती है। स्वयं के उन सभी पहलुओं को जिनका हम विचार कर सकें, वे सभी पूर्ण रूप से संतुष्ट एवं शुद्ध हो जाते हैं, और अंत में कृष्ण के पवित्र नाम के सर्वमंगल प्रभाव से वे परास्त हो जाते हैं। (शिक्षाष्टक १)
श्री चैतन्य महाप्रभु ने महामन्त्र का कीर्तन एवं जाप करने की शिक्षा दी और साथ ही अचिन्त्य-भेदाभेद-तत्त्व नामक एक संपूर्ण दार्शनिक प्रणाली की भी शिक्षा दी, जिस प्रणाली के अभ्यन्तर भारत की सभी अग्रगामी महान दार्शनिक प्रणालियां समा जाती हैं, जैसे कि आदिशंकराचार्य की अद्वैत प्रणाली, विष्णु स्वामी की शुद्धाद्वैत प्रणाली, निम्बार्काचार्य की द्वैताद्वैत प्रणाली, रामानुजाचार्य की विशिष्ठाद्वैत प्रणाली, एवं मध्वाचार्य की द्वैत प्रणाली। तत्त्विकी रूप से अचिन्त्य-भेदाभेद-तत्त्व परम-सत्य की समकालिक भेद एवं अभेद का सिद्धाांत है जिसकी पराकाष्ठा है प्रेम-भक्ति। इस हिसाब से, श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस जग में अध्यात्मिक परिपूर्णता को प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ दर्शन प्रकाशित किया है।
महामन्त्र के जाप के साथ साथ द्वापरयुग में प्रचलित मूर्ती-पूजा आज भी लोकप्रिय है। श्री मूर्ती, स्वयं श्री कृष्ण का अर्च-विग्रह प्रतिरूप है जो साधक के समक्ष विद्यमान रहता ताकि वह उसकी अर्चना कर सके और अपने मन व इन्द्रियों को भगवान पर केन्द्रित कर सके। जब एक शास्त्र-संत द्वारा अधिकृत अर्च-विग्रह उपस्थित होता है, तो उसकी पूजा को निर्जीव एवं अनधिकृत बुतों की पूजा समझकर उसका तिरस्कार नहीं करना चाहिए। आज, भक्ति-योग का अनुसरण करने वाली संस्थाओं में श्री कृष्ण के अर्च-विग्रह जैसे कि जगन्नाथ, पञ्चतत्त्व, गौर-निताइ, गौर-गदाधर, श्री नरसिंह और श्री श्री राधा-कृष्ण की अर्चना प्रचलित है।
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