सरल भावार्थ (हिंदी):
वैदिक प्रणाली में जीवन के चार आध्यात्मिक वर्गों की संस्तुति की गई है, ये हैं ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम और सन्यासाश्रम। ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाले विद्यार्थी को ब्रह्मचारी कहते हैं। पारिवारिक इकाइयों को ग्रहस्थाश्रम में वर्गीकृत किया गया है, समाज के निवृत बुजुर्गों को वानप्रस्थाश्रम में वर्गीकृत किया गया है, और सन्यासी वे होते हैं जो संपूर्ण रूप से त्यागी होते हैं, जो त्याग, तपस्या और ज्ञान की साधना में अपना जीवन बिताते हैं। समाज के सभी आध्यात्मिक और सामाजिक वर्गों में सन्यासियों को प्रधान माना जाता है।
वैदिक पण्डितों में कभी कभी यह विवाद उठता है कि सन्यास योग (कर्म का पूर्ण त्याग) और कर्मयोग (निःस्वार्थ कर्म) में से कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है। भगवद्गीता में श्री कृष्ण कहते हैं कि सन्यास-योग और कर्मयोग दोनों ही मुक्ती प्राप्त करने के लिए लाभदायक हैं। दोनों मार्गों से एक ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है, किन्तु इन दोनों में से कर्मयोग बेहतर है। कुछ पण्डितों के लिए यह विषय विवादात्मक है क्योंकि उनकी समझ के अनुसार, समाज के भाग्यहीण, गरीब और भूखे लोगों के हित के लिए किए जाने वाले परोपकारी कार्य को ही कर्मयोग कहते हैं।
इस तरह के परोपकारी कार्य अवश्य कल्याणकारी हैं, किन्तु हमें यह समझना चाहिए कि जब श्री कृष्ण भगवद्गीता में कर्मयोग की बात करते हैं तो वे विशेष तौर पर उन कार्यों का संकेत दे रहे हैं जो उनकी (श्री कृष्ण की) तृप्ति और आनन्द के लिए किए जाते हैं। इस प्रकार के कार्यों को कर्मयोग या भक्तियोग कहा जाता है क्योंकि इन कर्मों के फलों को श्री कृष्ण को अर्पित किया जाता है। दूसरे शब्दों में, परोपकारी कार्यों को केवल “पुण्य-कर्म” कहा जा सकता है किन्तु “कर्मयोग” नहीं, जब तक उन्हें श्री कृष्ण के आनन्द के लिए अर्पित नहीं किया जाता है।
जब कर्मयोग को भक्तियोग कहकर स्थापित किया जाता है तब सन्यास-योग पर उसकी श्रेष्ठता तुरंत साफ-जाहिर होने लगती है। सन्यास-योग को निभाना अत्यंत ही कठिन है। व्यक्ति बलपूर्वक अपने इन्द्रियों को वश में रखता है, और छोटे से छोटे सुविधाओं का भी त्याग करता है, जैसे कि स्नान के लिए गरम पानी का उपयोग, आरामदायक सोने की जगह इत्यादि। व्यक्ति को जंगल मे रहना पड़ता है, नियमित रूप से उपवास करना पड़ता है, और यौन-संयम जैसी तपस्याएं उसे स्वीकार करना पड़ता है। अधिकांश लोगों के लिए अगर यह असंभव नहीं तो कम से कम अत्यंत कठिन अवश्य ही है।
दूसरी ओर, कर्मयोग (भक्तियोग) को कोई भी अपना सकता है चाहे वह किसी भी अवस्था में क्यों न हो, और यह व्यक्ति जीवन के परम लक्ष्य की ओर तुरंत अग्रसर हो जाता है। कर्मयोग में व्यक्ति भक्तिकार्य में नियुक्त रहता है और बुनियादी नियमों का पालन करता है जैसे कि नशा न करना, अवैध यौन संबंध से मुक्त रहना, जूआ न खेलना, और मास, मच्छी एवं अण्डे का सेवन न करना। इस प्रकार के नियमों को कोई भी आसानी से पालन कर सकता है। इसी प्रकार, श्री कृष्ण की श्री मूर्त्ति की अराधना के साथ साथ, महामन्त्र (हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे) जपने की भक्ति प्रक्रिया को भी आसानी से अपनाया जा सकता है। कलियुग में श्री कृष्ण की आराधना करने के लिए मन्त्र जाप ही अनुशंसित प्रक्रिया है। इसलिए भगवद्गीता में कर्मयोग को ही प्रथम प्राथमिकता दी गई है।
परन्तु, जब सन्यास-योग का कर्मयोग के साथ जोड़ा जाता है एवं जब एक सन्यासी श्री कृष्ण की इच्छानुसार, हर तरह के यज्ञ एवं तपस्या का निष्पादन करता है, और भगवद्गीता का ज्ञान दूसरों को प्रदान करता है, तब ऐसा सन्यासी परम सिद्धी को प्राप्त करता है, और सहजता से दोनों ही मार्गों का गुरु मान लिया जाता है।
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