भक्ति की सभा
ॐ
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अध्याय 6

आत्मसंयमयोगः (ध्यानयोगः)

ध्यान योग (मन का निग्रह व आत्मसंयम)

श्लोक क्रमांक 1 अध्याय 6 • श्लोक ID #293

श्रीभगवानुवाच ।
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥६-१॥

śrībhagavānuvāca | anāśritaḥ karmaphalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ | sa saṁnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ || 6-1 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

भगवान श्री कृष्ण ने कहा, जो अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करता है और उन कार्यों के परिणामों का त्याग कर देता है, वह एक योगी एवं सन्यासी है। केवल अपने कर्मों का त्याग करके, बिना कोई कार्य किए, कोई भी सन्यासी नहीं बन सकता।

श्लोक क्रमांक 2 अध्याय 6 • श्लोक ID #294

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥६-२॥

yaṁ saṁnyāsamiti prāhuryogaṁ taṁ viddhi pāṇḍava | na hyasaṁnyastasaṅkalpo yogī bhavati kaścana || 6-2 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे पाण्डुपुत्र, जिसे सन्यास कहा जाता है वह दरसल योग के समान ही होता है। इद्रियों को संतुष्ट करने की इच्छा का त्याग किए बिना कोई कभी योगी नहीं बन सकता।

श्लोक क्रमांक 3 अध्याय 6 • श्लोक ID #295

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥६-३॥

ārurukṣormuneryogaṁ karma kāraṇamucyate | yogārūḍhasya tasyaiva śamaḥ kāraṇamucyate || 6-3 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो योग मार्ग की प्रारंभिक अवस्था में है, उसके लिए कर्म ही माध्यम है। और जो योग में अभ्यस्त है, उसके लिए कर्म का त्याग ही माध्यम है।

श्लोक क्रमांक 4 अध्याय 6 • श्लोक ID #296

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥६-४॥

yadā hi nendriyārtheṣu na karmasvanuṣajjate | sarvasaṅkalpasaṁnyāsī yogārūḍhastadocyate || 6-4 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जब किसी को ना तो इद्रिय-तृप्ति की वस्तुओं से लगाव होता है, और न उन गतिविधियों से जो उनके आनंद की ओर ले जाए, उस समय, यह कहा जाता है कि किसी ने योग प्राप्त कर लिया है।

श्लोक क्रमांक 5 अध्याय 6 • श्लोक ID #297

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥६-५॥

uddharedātmanātmānaṁ nātmānamavasādayet | ātmaiva hyātmano bandhurātmaiva ripurātmanaḥ || 6-5 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

मनुष्य को अपने मन के द्वारा स्वयं को ऊपर उठाना चाहिए ना कि अपने आप को नीचे गिरने देना। निश्चित रूप से, मन मनुष्यों का मित्र होने के साथ-साथ उनका सबसे बड़ा शत्रु भी है।

श्लोक क्रमांक 6 अध्याय 6 • श्लोक ID #298

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६-६॥

bandhurātmātmanastasya yenātmaivātmanā jitaḥ | anātmanastu śatrutve vartetātmaiva śatruvat || 6-6 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, उसके लिए मन ही उसका मित्र है। लेकिन, जिसने अपने मन को नियंत्रित नहीं किया है, उसके लिए उसका मन ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है।

श्लोक क्रमांक 7 अध्याय 6 • श्लोक ID #299

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥६-७॥

jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ | śītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ || 6-7 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जिन्होंने अपने मन को वश में कर लिया है और जो शांत हैं, उन्हें परमात्मा (परम चेतना) की अनुभूति प्राप्त होती है। ऐसे व्यक्तियों के लिए सर्दी-गर्मी, सुख-दुख, एवं मान-अपमान सभी एक समान होते हैं।

अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार अध्याय 6 • श्लोक ID #300

॥ अनुवृत्ति ॥

Anuvratti (6.1 - 6.7)

सरल भावार्थ (हिंदी):

कई टीकाकारों ने यह कहा है की, भगवद्गीता के छठे अध्याय में बताए गए ध्यान की विधियां, अष्टांगयोग नामक योग प्रणाली की अष्टसंख्यक प्रक्रियाओं से लिए गए हैं। योगसूत्रों के प्रसिद्ध रचयिता, पतंजलि ने अष्टांगयोग योग प्रणाली को क्रमबद्ध क्रम में इस प्रकार वर्णन किया है - सबसे पहले, हमें यम का अभ्यास करना चाहिए, जिसमें सूर्योदय से पहले बिस्तर से उठना, स्नान करना, वेदों का अध्ययन करना एवं पूजा की पद्धति शामिल है। नियम की प्रक्रिया में नशा, अवैध संबंध, जूआ, मांस, मछली एवं अंडे का सेवन वर्जित होता है। तत्पश्चात व्यक्ति शारीरिक व्यायाम एवं अभ्यास से अपने शरीर को अनुकूल बना कर आसनों का अभ्यास शुरू करता है, जिस का उद्देश्य संपूर्ण शारीरिक संतुलन पाना होता है। तब वह प्राणायाम करने के लिए अग्रसर होता है जिस में अपने श्वास को अन्दर एवं बाहर क्रमानुसार नियंत्रित करने का अभ्यास विभिन्न आसनों के साथ किया जाता है। जब आसन एवं प्राणायाम केवल स्वास्थ्य पाने के उद्देश्य से किया जाता है, तो कभी-कभी इसे हठ योग कहा जाता है। प्राणयाम के बाद प्रत्याहार का अनुसरण होता है, अर्थात, इद्रिय-वस्तुओं से इद्रियों को हटाना और मन को आत्मनिरीक्षण युक्त एवं अंतर्ज्ञानात्मक बनने के लिए प्रशिक्षित करना। तब जाकर कोई व्यक्ति अपने ध्यान में बिना विचलित हुए अपने मन को एक बिन्दु पर केन्द्रित कर पाता है। इसे धारण कहा जाता है, जो है एकाग्रचित्त की प्राप्ति। एक बार मन को एकाग्रचित्त करने की क्षमता प्राप्त करने के पश्चात, बाहरी स्रोतों द्वारा बिना ध्यान भंग किए हुए ही कोई वास्तविक ध्यान आरंभ कर सकता है। योग प्रणाली में ध्यान के कई रूप हैं, हालांकि, उनमें से कोई भी अवस्तुता या शून्यता पर ध्यान केन्द्रित करने की सलाह नहीं देते। योग में ध्यान लगाने के तीन मुख्य वस्तुएं हैं, ये हैं ब्रह्मन (पारलौकिक प्रकाश), परमात्मा (मूल परम-चेतना) और भगवान् (श्री कृष्ण)। समाधि अष्टांगयोग का अंतिम चरण है जिसमें, योगी भौतिक शरीर छोड़ने के समय, अपनी वांछित सिद्धी के लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। जो योगी ब्रह्मन या परमात्मा के प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, वे अपने शरीर का त्याग करने के पश्चात ब्रह्मज्योति में प्रवेश करते हैं, और जो योगी भगवान् के प्राप्ति की इच्छा रखते हैं वे वैकुण्ठ या गोलोक वृन्दावन में प्रवेश करते हैं जहां वे भगवान श्री कृष्ण की अलौकिक लीला में सम्मिलित होने जाते हैं। योग के कई आचार्यों के अनुसार, केवल भगवत् प्राप्ति ही शाश्वत है। ब्रह्मन या परमात्मा की प्राप्ति एवं सर्वोच्च ब्रह्मन में विलय होने के बाद भी, योगी को फिर से भौतिक दुनिया में वापस आना होगा एवं फिर से जन्म और मृत्यु के चक्र को शुरू करना होगा। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि क्रियाशीलता ही सभी जीवात्माओं की आंतरिक प्रकृति होती है। यद्यपि ब्रह्म-ज्योति में जो आनंद की भावना है वह भौतिक सुख की तुलना में हजारों गुना अधिक होती है, तिस पर भी कर्म करने की इच्छा बनी रहती है। लेकिन, चूंकि ब्रह्मन सिद्ध योगी एवं परमात्मा सिद्ध योगी श्री कृष्ण की भक्तिपूर्ण सेवा करने के योग्य नहीं हैं, वे आध्यात्मिक लोक में प्रवेश नहीं कर सकते, और इसलिए उन्हें निश्चित रूप से दोबारा इस भौतिक दुनिया में फिर से जन्म लेना पड़ेगा।

श्लोक क्रमांक 8 अध्याय 6 • श्लोक ID #301

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥६-८॥

jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ | yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥ || 6-8 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो योगी अपने ज्ञान एवं आत्म-साक्षात्कार के कारण आत्म-संतुष्ट रहता है, वह योगी अपने आध्यात्मिक स्वभाव में स्तिथ रहकर, एवं अपने इद्रियों को वश में रखकर, सभी वस्तुओं को एक समान रूप से देखता है, चाहे वह कंकर हो, या पत्थर हो, या सोना हो।

श्लोक क्रमांक 9 अध्याय 6 • श्लोक ID #302

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥६-९॥

suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadveṣyabandhuṣu | sādhuṣvapi ca pāpeṣu samabuddhirviśiṣyate || 6-9 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

ऐसा निष्पक्ष-प्रज्ञावान योगी, सभी को, एक सच्चा शुभचिंतक, एक स्नेही उपकारी, शत्रु, तटस्थ व्यक्ति, एक मध्यस्थ, एक ईर्ष्यालु व्यक्ति, एक रिश्तेदार, एक पवित्र व्यक्ति, और अधार्मिक व्यक्ती को एक समान भाव से देखता है।

श्लोक क्रमांक 10 अध्याय 6 • श्लोक ID #303

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥६-१०॥

yogī yuñjīta satatamātmānaṁ rahasi sthitaḥ | ekākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ || 6-10 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

एक योगी को अपने मन और शरीर को पूरी तरह से नियंत्रित करके एकांत स्थान में निवास करना चाहिए। उसे समस्त आकांक्षाओं तथा संग्रहभाव से मुक्त होकर लगातार अपने मन को, अपनी अंतरात्मा पर केन्द्रित करना चाहिए।

श्लोक क्रमांक 11 अध्याय 6 • श्लोक ID #304

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥६-११॥

śucau deśe pratiṣṭhāpya sthiramā繰namātmanaḥ | nātyucchritaṁ nātinīcaṁ cailājinakuśottaram || 6-11 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

योगी को एक निर्मल वातावरण में एक ऐसा आसन स्थापित करना चाहिए जो न तो बहुत ऊंचा हो ना बहुत नीचा, फिर उस आसन पर कुशा, मृगछाला, एवं मुलायम वस्त्र बिछाना चाहिए।

श्लोक क्रमांक 12 अध्याय 6 • श्लोक ID #305

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥६-१२॥

tatraikāgraṁ manaḥ kṛtvā yatacittendriyakriyaḥ | upaviśyāsane yuñjyādyogamātmaviśuddhaye || 6-12 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

इस आसन पर बैठकर योगी को मन, इन्द्रियों एवं कर्मों को वश में रखते हुए, मन को एक बिन्दु पर एकाग्रित करके, अपने हृदय को शुद्ध करने के लिए योगाभ्यास करना चाहिए।

श्लोक क्रमांक 13 अध्याय 6 • श्लोक ID #306

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥६-१३॥

samaṁ kāyaśirogrīvaṁ dhārayannacalaṁ sthiraḥ | samprekṣya nāsikāgraṁ svaṁ diśaścānavalokayan || 6-13 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

अपने शरीर, सिर एवं गर्दन को सीधा रखकर, योगी को अचल व स्थिर रहना चाहिए, और इस अवस्था में किसी अन्य दिशा पर बिना दृष्टि डाले, अपनी नाक के सिरे को ताकते रहना चाहिए।

श्लोक क्रमांक 14 अध्याय 6 • श्लोक ID #307

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥६-१४॥

praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivrate sthitaḥ | manaḥ saṁyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ || 6-14 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

अविचलित, निर्भय और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, उसे बैठकर, मुझे ही अपना सर्वोच्च लक्ष्य मानते हुए, मुझ पर ध्यान लगाकर अपने मन को वश में करना चाहिए।

श्लोक क्रमांक 15 अध्याय 6 • श्लोक ID #308

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥६-१५॥

yuñjannevaṁ sadātmānaṁ yogī niyatamānasaḥ | śāntiṁ nirvāṇaparamāṁ matsaṁsthāmadhigacchati || 6-15 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

इस तरह योगी भौतिक इच्छाओं से अपने मन को हटाकर उसे नियंत्रित कर लेता है। तब वह परम शांति एवं भौतिक अस्तित्व से मुक्ती पाकर, मेरा धाम प्राप्त कर लेता है।

श्लोक क्रमांक 16 अध्याय 6 • श्लोक ID #309

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥६-१६॥

nātyaśnatastu yogo'sti na caikāntamanaśnataḥ | na cāti svapnaśīlasya jāgrato naiva cārjuna || 6-16 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे अर्जुन, बहुत अधिक खाने से या बहुत कम खाने से, ज्यादा सोने से या बहुत कम सोने से, कोई योग अभ्यास नहीं कर सकता।

श्लोक क्रमांक 17 अध्याय 6 • श्लोक ID #310

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥६-१७॥

yuktāhāravihārasya yuktaceṣṭasya karmasu | yuktasvapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkhahā || 6-17 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो खाने और विश्राम करने में संयमित रहे, जो अपने सभी कार्यों को नियमित तरीके से करे, और जो अपने निद्रा एवं जागृत अवधियों में अच्छी संतुलन बनाए रखे, योग ऐसे व्यक्ति की पीड़ा को नष्ट कर देता है।

अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार अध्याय 6 • श्लोक ID #311

॥ अनुवृत्ति ॥

Anuvratti (6.8 - 6.17)

सरल भावार्थ (हिंदी):

श्री कृष्ण अर्जुन को एक बार दोबारा श्लोक १५ में बताते हैं कि योग का अंतिम लक्ष्य उनके सर्वोच्च धाम (वैकुंठ या गोलोक वृन्दावन) को प्राप्त करना है। वास्तव में यही योग पद्धति का अंतिम लक्ष्य है। यदि कोई व्यक्ति बहुत अधिक भोजन करता है या पर्याप्त भोजन नहीं करता है, तो वह योगी नहीं हो सकता। बहुत अधिक भोजन का यह भी अर्थ होता है कि शरीर को बनाए रखने के लिए मांसाहारी खाद्य पदार्थों का सेवन करना, जबकि वास्तव में यह आवश्यक नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि दूध को मांसाहारी मानकर इसके उत्पादों के सेवन से परहेज नहीं करना चाहिए। दूध संभावित सबसे पूर्ण भोजन है। दुग्ध उत्पाद एक मजबूत शारीरिक गठन के विकास में एवं हमारे मस्तिष्क की कोशिकाओं का पोषण करने में मदद करती हैं और इस प्रकार ये हमारी सोचने की क्षमता को भी विकसित करती है। योग एक ऐसी चीज है जिस का अभ्यास भारत में हजारों सालो होता आ रहा है, और तब से लेकर आज तक, योगियों ने दूध और दूध से बने पदार्थों का, जैसे कि दही, पनीर आदि के सेवन की अनुशंसा की है। केवल हाल ही के दिनों में कुछ लोगों ने दूध के उत्पादों को लेना बुरा समझ रखा है, लेकिन योग के आचार्यों ने कभी भी इस तरह के परहेज की अनुशंसा नहीं की है। उपरोक्त श्लोकों में उचित बैठने का ढंग, इद्रियों पर नियंत्रण एवं ब्रह्मचर्य का पालन करने की भी सिफारिश की गई है, क्योंकि ऐसी विधि के बिना वास्तव में कोई भी योगी नहीं हो सकता। ध्यान करते हुए, अन्य दिशाओं में नज़र डाले बिना नाक की नोक पर टकटकी लगाकर संपूर्ण एकाग्रता से धारणा करना, और श्री कृष्ण पर ध्यान लगाना ही ध्यान का सर्वोच्च लक्ष्य है। जहां तक संभव हो, योग का अभ्यास करने के लिए योगी को पवित्र (धार्मिक) स्थान पर ही निवास करने का प्रयास करना चाहिए। भारत में योगी, गंगा के तट पर, हरिद्वार, वाराणसी, या मायापुर में रहना पसंद करते ह, या किसी दूसरी पवित्र नदी जैसे कि यमुना, कावेरी, गोदवारी, के तट पर रहना पसंद करते हैं। कुछ योगी हिमालय के अभयारण्य को पसंद करते हैं, और कुछ अन्य चार-धाम (द्वारका, बदरीनाथ, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम) में निवास करना पसंद करते हैं। किसी भी स्थिति में, योगी को योग का अभ्यास करने के लिए उचित स्थान का चुनाव करना चाहिए। यदि कोई पवित्र स्थान पर या पवित्र नदी के तट पर रहने में असमर्थ है, तो उस व्यक्ति को एक आश्रम या योग समुदाय में रहने का प्रयास करना चाहिए। यदि कोई योग समुदाय में रहने में असमर्थ है तो व्यक्ति को अपने घर को पवित्र करना चाहिए, जहां पर श्री कृष्ण की पूजा और मंत्र साधना की जा सके। घर में चिंतन, अध्ययन और इद्रियों को नियंत्रित करने के लिए अनुकूल माहौल होना चाहिए। घर शांतिपूर्ण होना चाहिए और हिंसा, पशु हत्या, नशा आदि से मुक्त होना चाहिए। इस आधुनिक युग (कलियुग) में पशु-हत्या, नशा और कई अन्य प्रतिकूल गतिविधियां हर जगह पाई जाती हैं। इसलिए, योग अभ्यास के लिए उपयुक्त स्थान ढूंढना, विशेषकर अष्टांग-योग, राज-योग, हठ-योग आदि के लिए बहुत मुश्किल है| इसलिए कलियुग में भक्ति योग अनुशंसित प्रक्रिया है जिसमें ध्यान महा मंत्र के जप के माध्यम से किया जाता है - हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ महा-मंत्र का जाप इतना शक्तिशाली और पावन होता है कि जहाँ भी इसका जाप किया जाता है, वह उस स्थान को शुद्ध कर देता है। इस प्रकार भक्ति-योग प्रक्रिया का अभ्यास किसी भी जगह पर कहीं भी किया जा सकता है। कलियुग में भक्ति-योग ही वास्तव में एकमात्र अनुशंसित प्रक्रिया है। एक योगी को सदैव आत्म-संतुष्टि, ज्ञान एवं आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए। ऐसा योगी जो इस दुनिया में सदैव सब चीज़ों को एक भाव से देखता है वह अस्थायी प्रकृति की किसी भी वस्तु पर आसक्त नहीं होता। श्रीकृष्ण का कहना है कि एक योगी ‘सोना और पत्थर’ दोनों को एक समान भाव से देखता है। इसका यह मतलब नहीं है कि योगी साधारण वस्तुओं एवं सोने की चमक के अंतर को नहीं समझता, किंतु इसका अर्थ यह है कि योगी धन संग्रह से संतुष्टि पाने के विचार से आकर्षित नहीं होता। यह कहा गया है कि धन की कामना ही दुनिया को गोल घुमाती है। यह इस अर्थ में सत्य है कि धन की इच्छा ही अधिकांश लोगों को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन दुःख की बात है कि हम यह भी स्पष्ट रूप से देख रहे हैं कि धन का लोभ आज दुनिया को - राजनैतिक अशांति की पराकाष्ठा जो युद्ध, मृत्यु एवं विनाश, आर्थिक अस्थिरता के साथ-साथ पर्यावरण में चरम अस्थिरता की ओर लिये जा रहा है। इसके परिणाम स्वरूप ही प्राकृतिक आपदाएं हो रही हैं एवं प्राणियों की कई प्रजातियां भी विलुप्त हो रही हैं।

श्लोक क्रमांक 18 अध्याय 6 • श्लोक ID #312

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥६-१८॥

yadā viniyataṁ cittamātmanyevāvatiṣṭhate | niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyo yukta ityucyate tadā || 6-18 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जब स्थिर मन अनन्य भाव से स्वयं में स्थित होता है, तो वह व्यक्ति सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है - ऐसा व्यक्ति योग में स्थित कहा जाता है।

श्लोक क्रमांक 19 अध्याय 6 • श्लोक ID #313

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥६-१९॥

yathā dīpo nivātastho neṅgate sopamā smṛtā | yogino yatacittasya yuñjato yogamātmanaḥ || 6-19 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जिस तरह एक हवा रहित जगह पर एक ज्योति नहीं टिमटिमाती, उसी तरह स्वयं पर एकाग्रत एक योगी का मन कभी नहीं लहराता।

श्लोक क्रमांक 20 अध्याय 6 • श्लोक ID #314

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥६-२०॥

yatroparamate cittaṁ niruddhaṁ yogasevayā | yatra caivātmanātmānaṁ paśyannātmani tuṣyati || 6-20 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जब योगाभ्यास से मन संयमित और शांत हो जाता है, तो वह भौतिक इच्छाओं से अलग हो जाता है। तब वह व्यक्ति स्वयं की अनुभूति कर सकता है एवं आनंद की प्राप्ति करता है।

श्लोक क्रमांक 21 अध्याय 6 • श्लोक ID #315

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥६-२१॥

sukhamātyantikaṁ yattadbuddhigrāhyamatīndriyam | vetti yatra na caivāyaṁ sthitaścalati tattvataḥ || 6-21 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

सांसारिक इद्रियों के दायरे से परे और बुद्धि के माध्यम से प्राप्त, शाश्वत आनंद की इस अवस्था में स्थित होने के पश्चात, कोई भी वास्तविकता से विचलित नहीं होता।

श्लोक क्रमांक 22 अध्याय 6 • श्लोक ID #316

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥६-२२॥

yaṁ labdhvā cāparaṁ lābhaṁ manyate nādhikaṁ tataḥ | yasminsthito na duḥkhena guruṇāpi vicālyate || 6-22 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

इस स्थिति को प्राप्त करने के बाद, वह समझता है कि इससे श्रेष्ठ और कुछ नहीं है और वह बड़ी से बड़ी विपत्तियों में भी विचलित नहीं होता।

श्लोक क्रमांक 23 अध्याय 6 • श्लोक ID #317

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्जितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥६-२३॥

taṁ vidyād duḥkhasaṁyogaviyogaṁ yogasañjitam | sa niścayena yoktavyo yogo'nirviṇṇacetasā || 6-23 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

तुम्हें यह समझना चाहिए की यह अवस्था जिसमें समस्त दुःखों का निवारण हो जाता है, उसे ही योग कहते हैं।

श्लोक क्रमांक 24 अध्याय 6 • श्लोक ID #318

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६-२४॥

saṅkalpaprabhavānkāmāṁstyaktvā sarvānaśeṣataḥ | manasaivendriyagrāmaṁ viniyamya samantataḥ || 6-24 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

व्यक्ति को दृढ़ संकल्प और अटूट मन के साथ योग का अभ्यास करना चाहिए। योग का अभ्यास करने के लिए, व्यक्ति को उन सभी विचारों का त्याग करना चाहिए जो भौतिक इच्छाओं का कारण बनते हैं और इस प्रकार मन के द्वारा इन्द्रियों को वश में करके मन को इद्रिय-वस्तुओं से अलग करना चाहिए।

श्लोक क्रमांक 25 अध्याय 6 • श्लोक ID #319

शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६-२५॥

śanaiḥ śanairuparamedbuddhyā dhṛtigṛhītayā | ātmasaṁsthaṁ manaḥ kṛtvā na kiñcidapi cintayet || 6-25 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

धीरे-धीरे, बुद्धि के माध्यम से मन को स्थिर करना चाहिए, और उसे केवल स्वयं (आत्मा) पर केन्द्रित करना चाहिए, कहीं और नहीं।

श्लोक क्रमांक 26 अध्याय 6 • श्लोक ID #320

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥६-२६॥

yato yato niścarati manaścañcalamasthiram | tatastato niyamyaitadātmanyeva vaśaṁ nayet || 6-26 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

मन का स्वभाव चंचल और अस्थिर होता है। फिर भी, व्यक्ति को अपने मन को भटकने से रोक कर उसे अपनी आत्मा के अधीन में लाने का प्रयत्न करना चाहिए।

श्लोक क्रमांक 27 अध्याय 6 • श्लोक ID #321

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥६-२७॥

praśāntamanasaṁ hyenaṁ yoginaṁ sukhamuttamam | upaiti śāntarajasaṁ brahmabhūtamakalmaṣam || 6-27 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

परम आनंद उस योगी को प्राप्त होता है जिस ने अपने जुनून को वश में कर लिया है, जिस का मन शांत है, जो बुरे व्यसनों से मुक्त है, और जो सदैव आध्यात्मिक धरातल पर स्थित रहता है।

श्लोक क्रमांक 28 अध्याय 6 • श्लोक ID #322

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥६-२८॥

yuñjannevaṁ sadātmānaṁ yogī vigatakalmaṣaḥ | sukhena brahmasaṁsparśamatyantaṁ sukhamaśnute || 6-28 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

इस प्रकार, योग के निरंतर अभ्यास के माध्यम से, एक योगी जो भौतिक संदूषण से रहित है, परम-सत्य के संपर्क के माध्यम से शाश्वत परमानंद की प्राप्ति कर सकता है।

अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार अध्याय 6 • श्लोक ID #323

॥ अनुवृत्ति ॥

Anuvratti (6.18 - 6.28)

सरल भावार्थ (हिंदी):

योग के अभ्यास के लिए मन का नियंत्रण सर्वोत्कृष्ट है। समस्या स्वयं के मन के स्वभाव के कारण ही उत्पन्न होती है। मन का स्वभाव चंचल और अस्थिर है, यह सदैव इधर-उधर भटकता रहता है और एक इन्द्रिय-वस्तु से अगले वस्तु तक जाता रहता है। नींद में भी मन का भटकना सक्रिय रहता है। लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं, एक योगी को सदैव अपने मन को उच्च चेतना के नियंत्रण में रखने का प्रयास करना चाहिए। वास्तव में यह योगी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है जिस का उसे सबसे पहले समना करना पड़ता है। कुछ पश्चिमी दार्शनिक प्रणालियों में मन की कल्पना स्वयं के रूप में की जाती है, लेकिन योग में यह उचित नहीं है। मन को योग में आंतरिक इन्द्रिय’ कहा जाता है। शरीर की इन्द्रियां जैसे दृष्टि, ध्वनि, स्पर्श, सूंघना एवं स्वाद बाहरी वस्तुओं के साथ जुड़े होते हैं और मन संकाय के रूप में कार्य करता है जो अंततः ऐंद्रिय अनुभवों का तात्पर्य समेट कर प्रस्तुत करता है। लेकिन योग में आत्मा की कल्पना एक तत्त्व के रूप में की जाती है जो मन और शरीर से स्वतंत्र होता है। इसलिए, योग के ज्ञान के अनुसार, शरीर और मन की मृत्यु होने पर भी आत्मा की मृत्यु नहीं होती! यह बिल्कुल कुछ अलग सा है। योग प्रणाली के भीतर कई बाह्य पद्धति (बाहरी प्रक्रिया) हैं जैसे कि उपवास करना, एकांत स्थान में रहना जो मन के नियंत्रण में मदद करते हैं। लेकिन मन का स्वभाव वायु की तरह होने के कारण, ये बाहरी तरीके अक्सर अपर्याप्त रह जाते हैं। परन्तु, भक्ति-योग की पद्धति में मंत्र द्वारा मन को नियंत्रित करने की अनुशंसा की जाती है। मंत्र शब्द की उत्पत्ति दो संस्कृत शब्दों से हुई है - ‘मन’ (मन) और ‘त्रायते’ (नियंत्रण करने के लिए)। मन को मंत्र जप की प्रक्रिया में व्यस्त करने से - विशेष रूप से महामंत्र के जाप से, चंचल मन स्वयं (आत्मा) पर स्थिर हो जाता है। महामंत्र परम-सत्य श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष ध्वनि निरूपण है। वैसे तो, महामंत्र दोनों ही सर्व शक्तिशाली एवं सर्वाकर्षक है। महा-मंत्र के प्रभाव से जीवित प्राणियों की वास्तविक पहचान को आवृत करने वाला अज्ञान दूर हो जाता है, और महामंत्र की सर्व-आकर्षक प्रकृति, जप करने वाले के हृदय को परम आध्यात्मिक आनंद से परिपूर्ण कर देता है। इसलिए (इन कारणों से) मन को नियंत्रित और स्थिर करने के लिए महामंत्र का जप अत्यधिक अनुशंसित है।

श्लोक क्रमांक 29 अध्याय 6 • श्लोक ID #324

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥६-२९॥

sarvabhūtasthamātmānaṁ sarvabhūtāni cātmani | īkṣate yogayuktātmā sarvatra samadarśanaḥ || 6-29 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो परम-सत्य से जुड़ा होता है, वह सभी चीजोों को समान रूप से देखता है। वह सभी जीवित प्राणियों में परमात्मा को देखता है एवं सभी प्राणियों को परमात्मा में देखता है।

श्लोक क्रमांक 30 अध्याय 6 • श्लोक ID #325

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६-३०॥

yo māṁ paśyati sarvatra sarvaṁ ca mayi paśyati | tasyāhaṁ na praṇaśyāmi sa ca me na praṇaśyati || 6-30 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझ में देखता है उसके लिए न तो मैं कभी लुप्त होता हूँ और न मेरे लिए कभी वह लुप्त होता है।

श्लोक क्रमांक 31 अध्याय 6 • श्लोक ID #326

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६-३१॥

sarvabhūtasthitaṁ yo māṁ bhajatyekatvamāsthitaḥ | sarvathā vartamāno'pi sa yogī mayi vartate || 6-31 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

वह योगी जो मुझे इस ज्ञान के साथ पूजता है कि मैं सभी जीवित प्राणियों में (परम चेतना के रूप में) स्थित हूँ, सभी परिस्थितियों में मेरे साथ रहता है।

श्लोक क्रमांक 32 अध्याय 6 • श्लोक ID #327

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६-३२॥

ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśyati yo'rjuna | sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ || 6-32 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे अर्जुन, जो सभी के सुख और दुःख को समता से देखता (सम्मान देता) है, जैसे कि ये (सुख और दुःख) उसके अपने हैं, वह योगियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

श्लोक क्रमांक 33 अध्याय 6 • श्लोक ID #328

अर्जुन उवाच ।
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥६-३३॥

arjuna uvāca | yo'yaṁ yogastvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana | etasyāhaṁ na paśyāmi cañcalatvātsthitiṁ sthirām || 6-33 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

अर्जुन ने कहा - हे मधुसूदन, आपने योग की जिस पद्धति का वर्णन किया है मैं उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता क्योंकि स्वभाव से ही मन बहुत अस्थिर (चंचल) है।

श्लोक क्रमांक 34 अध्याय 6 • श्लोक ID #329

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥६-३४॥

cañcalaṁ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavaddṛḍham | tasyāhaṁ nigrahaṁ manye vāyoriva suduṣkaram || 6-34 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

मन अनियमित, अशांत, बहुत शक्तिशाली और हठी (जिद्दी) है। हे कृष्ण, मुझे लगता है कि इसे नियंत्रित करना उतना ही कठिन है जितना कि वायु को नियंत्रित करने का प्रयास करना।

श्लोक क्रमांक 35 अध्याय 6 • श्लोक ID #330

श्रीभगवानुवाच ।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥६-३५॥

śrībhagavānuvāca | asaṁśayaṁ mahābāho mano durnigrahaṁ calam | abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate || 6-35 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर दिया - हे महाबाहो, कुन्तीपुत्र! निस्सन्देह चंचल मन को वश में करना अत्यन्त ही कठिन है; किन्तु उपयुक्त अभ्यास एवं विरक्ति द्वारा मन को वश में करना सम्भव है।

श्लोक क्रमांक 36 अध्याय 6 • श्लोक ID #331

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥६-३६॥

asaṁyatātmanā yogo duṣprāpa iti me matiḥ | vaśyātmanā tu yatatā śakyo'vāptumupāyataḥ || 6-36 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

मेरा निष्कर्ष यह है कि अगर किसी का मन अनियंत्रित हो तो उसके लिए योग कठिन है। किंतु जब व्यक्ति उचित अभ्यास द्वारा मन को नियंत्रित करने का प्रयास करता है तब वह सफल हो सकता है।

अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार अध्याय 6 • श्लोक ID #332

॥ अनुवृत्ति ॥

Anuvratti (6.29 - 6.36)

सरल भावार्थ (हिंदी):

श्रीमद्भगवद्गीता में पाँच प्राथमिक विषयों की व्यख्या की गई है, जैसे कि, आत्मा (व्यक्तिगत चेतना), प्रकृति (भौतिक प्रकृति), कर्म (क्रिया), काल (समय) और ईश्वर (परम नियन्ता)। भगवान् श्रीकृष्ण को ही सभी वस्तुओं के अंतर्निहित सिद्धाांत के रूप में समझना ही ज्ञान के अर्जन की पराकाष्ठा है। परन्तु भगवद्गीता के कुछ टीकाकारों ने बिना श्रीकृष्ण के ही गीता की व्याख्या करने की चेष्टा की है। यानी की उन्होंने ऐसी बातें कही है कि, “श्रीकृष्ण केवल परम ब्रह्मन के ही अस्थायी अभिव्यक्ति थे,” “व्यक्ति के रूप में उनका कोई शाश्वत अस्तित्व नहीं है,” या जब श्रीकृष्ण ऐसी बातें कहते हैं जैसे कि, “वह मेरे धाम की प्राप्ति करता है,” तो वास्तव में श्रीकृष्ण का अर्थ यह है कि वह कुछ अन्य अवैयक्तिक (व्यक्तित्वहीन) प्रकृति को प्राप्त करता है। यद्यपि, योग के सच्चे गरू एवं वैदिक साहित्य के विद्वान इस प्रकार के विचारों को अस्वीकार करते हैं। हालांकि, भगवद्गीता, निश्चित रूप से गूढ़ (रहस्यमय) है, इस कारण से कि यह परम सत्य का विस्तृत रूप से निरूपण करता है और यह बताता है की उस परम सत्य को कैसे प्राप्त किया जाए, तब भी परम-सिद्धि के विषय पर यह कोई प्रतीकात्मक या काल्पनिक लेख नहीं है। भगवद्गीता को अक्षरश (पूरी तरह से) श्रीकृष्ण और उनके प्रिय मित्र एवं भक्त अर्जुन के बीच वार्तालाप के रूप में लिया जाना चाहिए। इसी में भगवद्गीता को समझने का खुला रहस्य निहित है। श्रीकृष्ण वही कहते हैं जो वे वास्तव में कहना चाहते हैं और जो वे वास्तव में कहना चाहते हैं वही वे कहते हैं, इस कारण, भगवद्-गीता पर कोई अमूर्त काल्पनिक टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है। कि श्रीकृष्ण हर जगह, सभी वस्तुओं में एवं सभी प्राणियों के हृदय में वास करते हैं यह उपरोक्त छंदों में स्थापित किया गया है। श्रीकृष्ण का कहना है कि वह सभी जीवित प्राणियों में परमात्मा के रूप में वास करते हैं और सभी जीवित प्राणी उनके अभिन्न अंग हैं। श्रीकृष्ण सभी में हैं, एवं सबकुछ श्रीकृष्ण में निहित है। जो इस तरह से देखने का प्रयास करता है वह प्रबुद्ध (ज्ञानी) बन जाता है - सचमुच इस प्रकार की दृष्टि को ही ज्ञानोदय (ज्ञान का अनुभव) कहते हैं। अर्जुन एक आत्म-सिद्ध योगी एवं श्रीकृष्ण के नित्य संगी होने के नाते, ऐसे निष्कर्षों पर श्रीकृष्ण के साथ वे तर्क नहीं करते हैं। परन्तु ऐसी सिद्धि प्राप्त करने के लिए योग की कठोरता पर अर्जुन आपत्ति व्यक्त ज़रूर करते हैं। अर्जुन कई जिम्मेदारी वाले एक पारिवारिक व्यक्ति थे, इसलिए वे योग का अभ्यास कैसे कर सकते थे? अर्जुन अपने परिस्थिति को ही उदाहरण बनाकर आम जनता के पक्ष में बहस करते हैं, कि श्रीकृष्ण द्वारा अब तक वर्णित मन को वश करने की कड़ी योग प्रणाली बहुत ही कठिन है। यह महज़ अव्यावहारिक है। अर्जुन के लिए श्रीकृष्ण का यह आश्वासन है कि यदि कोई दृढ़ संकल्प से अभ्यास करे तो वह अवश्य सफल होगा। लेकिन अर्जुन की बात को समझते हुए, अपनी भगवद्गीता के प्रवचन में आगे चलते, श्रीकृष्ण निश्चित ही परम-सत्य की प्राप्ति को सभी की पहुंच में ले आएंगे।

श्लोक क्रमांक 37 अध्याय 6 • श्लोक ID #333

अर्जुन उवाच ।
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चचलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥६-३७॥

arjuna uvāca | ayatiḥ śraddhayopeto yogāccalitamānasaḥ | aprāpya yogasaṁsiddhiṁ kāṁ gatiṁ kṛṣṇa gacchati || 6-37 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण, एक ऐसे व्यक्ति की गन्तव्य स्थान क्या है जिसमें श्रद्धा है किंतु योग की प्रक्रिया से अपने मन को वश में न कर पाने से वह सिद्धि प्राप्त नहीं करता?

श्लोक क्रमांक 38 अध्याय 6 • श्लोक ID #334

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥६-३८॥

kaccinnobhayavibhraṣṭaśchinnābhramiva naśyati | apratiṣṭho mahābāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi || 6-38 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे महाबाहु कृष्ण, क्या ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक पथ पर भ्रमित होकर, बिना आश्रय के, बिखरे बादल की भाँति विनष्ट हो जाता है?

श्लोक क्रमांक 39 अध्याय 6 • श्लोक ID #335

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥६-३९॥

etanme saṁśayaṁ kṛṣṇa chettumarhasyaśeṣataḥ | tvadanyaḥ saṁśayasyāsya chettā na hyupapadyate || 6-39 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे कृष्ण, केवल आप ही मेरा संदेह पूरी तरह से मिटा सकते हैं, कोई और नहीं।

श्लोक क्रमांक 40 अध्याय 6 • श्लोक ID #336

श्रीभगवानुवाच ।
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥६-४०॥

śrībhagavānuvāca | pārtha naiveha nāmutra vināśastasya vidyate | na hi kalyāṇakṛtkaściddurgatiṁ tāta gacchati || 6-40 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर दिया - हे पार्थ, ऐसा व्यक्ति न इस जन्म में ना अगले जन्म में विनष्ट होता है। जो धर्म का आचरण करता है वह कभी भी दुर्भाग्य का सामना नहीं करता।

श्लोक क्रमांक 41 अध्याय 6 • श्लोक ID #337

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥६-४१॥

prāpya puṇyakṛtāṁ lokānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ | śucīnāṁ śrīmatāṁ gehe yogabhraṣṭo'bhijāyate || 6-41 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

जो योग के अभ्यास से भटक जाते हैं वे स्वर्गिक लोकों को प्राप्त करते हैं और कई वर्षों तक वहीं रहते हैं। उसके पश्चात, वह किसी कुलीन और समृद्ध परिवार में मनुष्यों के बीच जन्म लेते हैं।

श्लोक क्रमांक 42 अध्याय 6 • श्लोक ID #338

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥६-४२॥

athavā yogināmeva kule bhavati dhīmatām | etaddhi durlabhataraṁ loke janma yadīdṛśam || 6-42 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

अन्यथा, वे एक विद्वान योगी के परिवार में जन्म लेते है। निस्संदेह, इस तरह का जन्म इस संसार में दुर्लभ होता है।

श्लोक क्रमांक 43 अध्याय 6 • श्लोक ID #339

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥६-४३॥

tatra taṁ buddhisaṁyogaṁ labhate paurvadehikam | yatate ca tato bhūyaḥ saṁsiddhau kurunandana || 6-43 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

हे कुरु वंशज, अपने पिछले जन्मों में प्राप्त योग के ज्ञान को पुनः समेट कर, वे सफल होने का पुनः प्रयास करते हैं।

श्लोक क्रमांक 44 अध्याय 6 • श्लोक ID #340

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥६-४४॥

pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśo'pi saḥ | jijñāsurapi yogasya śabdabrahmātivartate || 6-44 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

अपने पिछले जीवन के अभ्यास के कारण, वे स्वतः ही योग की प्रक्रिया के प्रति आकर्षित हो जाते हैं। एवं, इस योग की प्रक्रिया पर केवल जिज्ञासा करके, वे बड़ी आसानी से वेद के अनुष्ठानों से परे स्तिथ हो जाते हैं।

श्लोक क्रमांक 45 अध्याय 6 • श्लोक ID #341

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥६-४५॥

prayatnādyatamānastu yogī saṁśuddhakilbiṣaḥ | anekajanmasaṁsiddhastato yāti parāṁ gatim || 6-45 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

सच्ची निष्ठा से प्रयत्न करने के बाद योगी सभी संदूषणों से शुद्ध हो जाता है और अनेकानेक जन्मों के अभ्यास के पश्चात सिद्ध होकर वह परम गन्तव्य को प्राप्त करता है।

श्लोक क्रमांक 46 अध्याय 6 • श्लोक ID #342

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥६-४६॥

tapasvibhyo'dhiko yogī jñānibhyo'pi mato'dhikaḥ | karmibhyaścādhiko yogī tasmādyogī bhavārjuna || 6-46 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

ऐसा योगी, एक तपस्वी (जो घोर तपस्या करता है), एक ज्ञानी (जो बौद्धिक खोज द्वारा पूर्णता को प्राप्त करने की कोशिश करता है), और एक कर्मी (जो वैदिक अनुष्ठानों द्वारा मोक्ष पाने की कोशिश करता है) से भी श्रेष्ठ होता है। यही मेरा निष्कर्ष है, हे अर्जुन - इसलिए तुम एक योगी बनो!

श्लोक क्रमांक 47 अध्याय 6 • श्लोक ID #343

योगिनापि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥६-४७॥

yogināmapi sarveṣāṁ madgatenāntarātmanā | śraddhāvānbhajate yo māṁ sa me yuktatamo mataḥ || 6-47 ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

मैं भक्ति-योगी को सभी योगियों में से सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ, जो मुझ में दृढ़ रहते हैं, जो मुझ पर ध्यान करते हैं और दृढ़ श्रद्धा से मेरी पूजा करते हैं!

अनुवृत्ति एवं दार्शनिक सार अध्याय 6 • श्लोक ID #344

॥ अनुवृत्ति ॥

Anuvratti (6.37 - 6.47)

सरल भावार्थ (हिंदी):

श्लोक ३७ एवं ३८ में अर्जुन के प्रश्न हमारी जानकारी के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। अर्जुन जानना चाहता है कि जो थोड़े समय के लिए योग का अभ्यास करता है, किंतु किसी कारणवश आत्म-साक्षात्कार प्राप्त नहीं करता, और मृत्यु के कारण शरीर का त्याग कर देता है, उसका क्या होता है। ऐसे व्यक्ति की अगले जन्म में क्या नियति है? यहाँ ध्यान देने वाली पहली बात यह है कि अर्जुन जानता है एवं पूरी तरह से आश्वस्त है कि मात्र एक जीवनकाल सब कुछ नहीं होता। जैसा कि श्रीकृष्ण ने पहले कहा है, हमने अतीत में कई जीवन बिताए थे और भविष्य में भी हमारे कई जीवन होंगे। इसलिए अर्जुन अपनी या किसी ऐसे व्यक्ति की नियती जानना चाहते हैं, जो योग का अभ्यास करता है, परन्तु सिद्धि प्राप्त नहीं कर पाता। अगले जन्म में ऐसे व्यक्ति का क्या गन्तव्य होगा? श्रीकृष्ण का उत्तर सर्वज्ञ परम पुरुष का उत्तर है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि एक योगी का कभी नुकसान नहीं होता। यदि कोई इस जीवन में योग-सिद्ध नहीं हो पाता है, तो अगले जीवन में वह व्यक्ति एक अनुकूल परिस्थितियों में जन्म लेता है और दोबारा इस प्रक्रिया को वहीं से शुरू करता है। अगले जन्म में, वह दोबारा योग के अभ्यास से आकर्षित होता है और वह अपने पथ पर जारी रहता है। भले ही इसमें कई जीवनकाल लग जाये, योगी अपनी दृढ़ता और दृढ़ संकल्प से, सर्वोच्च गंतव्य को प्राप्त करता है। इसलिए, श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, सभी परिस्थितियों में, एक योगी बनो।

श्लोक क्रमांक 48 अध्याय 6 • श्लोक ID #345

ॐ तत्सदिति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां
वैयासिक्यां भीष्मपर्वाणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
ध्यानयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥

oṁ tatsaditi śrīmahābhārate śatasāhasryāṁ saṁhitāyāṁ vaiyāsikyāṁ bhīṣmaparvāṇi śrīmadbhagavadgītāsūpaniṣatsu brahmavidyāyāṁ yogaśāstre śrīkṛṣṇārjunasaṁvāde dhyānayogo nāma ṣaṣṭho'dhyāyaḥ ||

सरल भावार्थ (हिंदी):

ॐ तत् सत् – अतः व्यास विरचित शतसहस्र श्लोकों की श्री महाभारत ग्रन्थ के भीष्म-पर्व में पाए जाने वाले आध्यात्मिक ज्ञान का योग-शास्त्र - श्रीमद् भगवद् गीतोपनिषद् में श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद से लिए गए ध्यान योग नामक छठे अध्याय की यहां पर समाप्ती होती है।

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भक्ति की सभा
सनातन धर्म की अपनी सभा पवित्र श्लोक व व्याख्या लोड हो रही है...
सत्यम् शिवम् सुन्दरम्