सरल भावार्थ (हिंदी):
यहाँ पर जगत निर्माण के मूल भौतिक तत्त्वों का उल्लेख किया गया है। पृथ्वी, जल, अग्नि, और हवा को अधिकांश भाग में समझना आसान है - जबकि, अदृश्य तत्व ‘ख़म’ या आकाश को समझना मुश्किल है। ‘खम’ (आकाश) को जीवन को समाने वाले स्थान के रूप में परिभाषित किया गया है। बहुत समय से, आधुनिक विज्ञान ने ‘खम’ (आकाश या नभ) को एक मूल भौतिक तत्त्व समझने वाली भगवद्गीता की अवधारणा को अस्वीकार किया है। हालांकि, एक बार फिर से वैज्ञानिक समुदाय को गंभीर परेशानियों का समाना करना पड़ रहा है कि ब्रह्मांड में वे उस पकड़ में न आनेवाले पदार्थ का कैसे पता लगाए जिससे की वे यह समझा सके की ब्रह्मांड कैसे काम करता है। भौतिक विज्ञानियों का कहना है कि यह तत्त्व ब्रह्मांड के ८०% या उससे भी अधिक भाग को बनाती है, लेकिन उनके लिए यह अज्ञात है, और इसका पता लगाने में अब तक वे असमर्थ रहे हैं। उन्होंने इसे ‘डार्क मैटर’ (अज्ञात द्रव्य) कहा है।
१९३३ में “डार्क मैटर” की घटना के अस्तित्व का पता लगाने वाले पहले व्यक्ति कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के स्विस ‘एस्ट्रोफिजिस्ट’ (तारा-भौतिकविद) फ्रिट्ज़ ज़्विकी थे।
ज़्विकी ने कोमा नामक आकाशगंगाओं के समूह में वायरल प्रमेय का उपयोग करके अदृष्ट (अप्रत्यक्ष) द्रव्यमान का प्रमाण प्राप्त किया। ज़्विकी ने इस समूह की कुल द्रव्यमान का अनुमान, समूह के छोड़ पर स्थित आकाशगंगाओं की गति के आधार पर लगाया, और इस प्रकार पाए गए अनुमान की तुलना उन्होंने आकाशगंगाओं की कुल संख्या और समूह की कुल प्रभा पर आधारित अनुमान के मुकाबले की। उन्होंने संख्या और प्रभा द्वारा किए गए आकलन से लगभग चार-सौ गुना अधिक द्रव्यमान पाया! कुंज समूह में दृश्यमान आकाशगंगाओं का गुरुत्वाकर्षण उनकी तेज़ कक्षाओं के अनुपात में बहुत कम होने के कारण कुछ अतिरिक्त की आवश्यकता देखी गई। इसे ‘मिसिंग मास प्रॉब्लम’ (द्रव्यमान अनुपस्थिती की समस्या) के नाम से जाना जाता है। इन निष्कर्षों के आधार पर, ज़्विकी ने अनुमान लगाया कि इस मामले में कुछ अदृश्य द्रव्यमान होना चाहिए जो क्लस्टर (कुंज समूह) को एक साथ रखने के लिए पर्याप्त द्रव्यमान और गुरुत्वाकर्षण प्रदान कर रहा है। यही पर ‘डार्क मैटर’ (अज्ञात द्रव्यमान) की खोज की शुरुआत थी।
अठहत्तर (७८) साल के बाद, विज्ञान अभी भी ‘डार्क मैटर’ की तलाश में है। वे जानते हैं कि यह वस्तुतः हर जगह विद्यमान है, परन्तु यह द्रव्यमान पता लगाने के प्रक्रम से बच जाता है और इसलिए वे इसका प्रेक्षण करने में असमर्थ हैं। श्रीमद्भागवतम् एक ऐसे भौतिक तत्त्व की पहचान करता है, जिस के अन्य गुणों में से एक गुण यह है कि यह काफी हद तक पकड़ में न आनेवाली वस्तु है। यह सर्वव्यापी है, लेकिन साथ ही साथ इसका पता लगना असंभव है। भागवतम् के अनुसार इस तत्त्व को ‘नभ’ कहा जाता है, और भगवद्गीता में इसका उल्लेख ‘खम’ कहकर किया गया है।
‘खम’ तत्त्व की गतिविधियों, गुणों और विशेषताओं को वस्तु-समायोजन के लिए स्थान या जगह के रूप में देखा जा सकता है। जगह या स्थान, आंतरिक हो या बाह्य, दोनों को ही खम कहा जाता है। यदि भौतिकविदों द्वारा ध्यान दिया जाए, तो “मिसिंग मास प्रॉब्लम’ (द्रव्यमान अनुपस्थिती की समस्या) खम के लिए उपयुक्त हो सकता हैं। खम एक भौतिक तत्त्व होने के नाते, सैद्धांतिक रूप से इसे एक ‘संख्यात्मक कोड’ सौंपा जा सकता है - फिर उन्हें वह मिल सकता है जो वह ढूंढ रहे हैं।
वैदिक विचार के अनुसार किसी भी वस्तु का महत्त्व उसके गुणों की तुलना में द्वितीय है - इसका अर्थ यह है, कि अन्वेषण के लिए किसी भी पदार्थ के गुणों का ज्ञान होना, उस पदार्थ के हाथ में होने के बराबर या उससे भी बेहतर है। इस हिसाब से, आधुनिक विज्ञान, ‘डार्क मैटर’ का पता लगा चुका है, क्योंकि वैज्ञानिक इसके गुणों को लगभग समझ चुके हैं - परन्तु इसी बात को उन्होंने अभी तक बूझा नहीं है। श्रीमद्भागवतम् में नीचे लिखा श्लोक है -
भूतानां छिद्र-दातृत्वं बहिरन्तरमेव च ।
प्राणेन्द्रियात्मा-धिष्ण्यत्वं नभसो वृत्ति-लक्षणम् ॥
नभस की गतिविधियों और लक्षणों को इस प्रकार देखा जा सकता है कि यह सभी जीव जंतुओं के बाहरी एवं अंदरूनी अस्तित्व को समायोजित करती है, अर्थात प्राण-वायु, इन्द्रियां, एवं मन के क्रिया-क्षेत्र।
यह श्लोक एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक अन्वेषण कार्य का संभवनीय आधार बन सकता है। यह श्लोक हमें समझाता है कि कैसे नभस से सूक्ष्म रूप उद्भव होते हैं, उनके क्या लक्षण और क्रियाएं होती हैं, एवं कैसे इस सूक्ष्म रूप से स्पर्शनीय पदार्थ प्रकट होते हैं, जैसे कि वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी।
भागवतम् केवल इन आधारभूत पदार्थों की सूची नहीं देता, बल्कि काफी हद तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही समझाता है कि अस्तित्व के सबसे सूक्ष्म स्तर से लेकर ब्रह्माण्ड के खंडों तक कैसे पदार्थों का विकास होता है - यह सचमुच ही काफि विस्तृत एवं वैज्ञानिक है। फिर भी, द्रव्यों के इस ज्ञान का पूरा फायदा उठाकर संसार की सृष्टि के रहस्य को खोलने के लिए आधुनिक विज्ञान को अपने ज्ञात पदार्थों की सारणी में केवल खम को ही नहीं बल्कि अहंकार, मन, एवं बुद्धि को भी जोडना होगा। क्योंकि वाकई, भगवद्गीता इन्हें भौतिक पदार्थ ही कहती है। इसके अलावा, अहंकार, मन, और बुद्धि को खम से भी सूक्ष्म श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है, क्योंकि लक्षण से ही ये पदार्थ, आत्मा के लक्षणों के बहुत समीप हैं।
स्थूल और सूक्ष्म भौतिक पदार्थों को वैज्ञानिक आवर्त सारणी में जोडने के अतिरिक्त, भगवद्गीता में यह भी कहा गया है कि आत्मा (चेतना) और परमात्मा (परम चेतना) - इन दो दिव्य एवं भौतिक-विरोधी अवधारणाओं को जोड़े बिना, अस्तित्व और वास्तव को पूरी तरह से समझना सम्भव नहीं है। ऐसा लगता है कि ‘डार्क मैटर’ से भी अधिक, आधुनिक-विज्ञान इस तत्त्व से जूझ रहा है। हमने इस तत्त्व को ‘लाइट मैटर’ का नाम दिया है।
मन और बुद्धि को आत्मा मानकर भ्रमित नहीं होना चाहिए। असल में मन और बुद्धि जड़ पदार्थों से उद्भव नहीं होते, हालांकि कुछ दार्शनिक यही सुझाव देते हैं। सूची के अंत में है अहंकार (मिथ्या अहंकार)। ये सब भौतिक पदार्थ हैं जो श्री कृष्ण की अप्रधान शक्ति अपरा प्रकृति द्वारा प्रकट किए जाते हैं। ये स्थूल और सूक्ष्म पदार्थ भौतिक शरीर को बनाते हैं और इस तरह आत्मा को आच्छादित करते हैं।
भौतिक पदार्थों से प्रतिबंधित जीव स्वयं को अपना शरीर मानते हैं। किंतु कृष्ण कहते हैं कि उनकी एक और शक्ति है - एक उत्कृष्ट शक्ति, जो चेतन शक्ति है, और सभी जीवात्माएं इसी में शामिल होते हैं।
भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से स्थूल एवं सूक्ष्म भौतिक पदार्थ, और साथ साथ चेतना एवं परम-चेतना, दोनों की व्याख्या दी गई है। जो कोई सिद्धांत इन तत्त्वों को शामिल नहीं करते, वे अधूरे हैं।
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