सरल भावार्थ (हिंदी):
श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्नों का प्रासंगिक उत्तर देते हैं और यदि कोई श्रीकृष्ण को योग के परम-गुरु के रूप में स्वीकार करता है, जोकि वे सचमुच हैं, तो वह शीघ्र ही सबसे अनमोल ज्ञान प्राप्त करता है। उचित ज्ञान प्राप्त करने के लिए अटकलबाजी या ‘परीक्षण और त्रुटि’ की प्रक्रिया का उपयोग महज़ मूल्यवान समय को बर्बाद करना है। वास्तव में, अटकलों और प्रयोग में इतना समय बर्बाद होता है कि सदियों के बाद भी ऐसी प्रक्रियाएं जीवन के अर्थ का उचित ज्ञान देने में निष्फल रही हैं। हर कोई मृत्यु के मुंह में जा रहा है, और इनमें से अधिकांश जीवन के सबसे बुनियादी प्रश्नों के उतर जाने बगैर ही मर रहे हैं। हालांकि, अनादि काल से, श्रीकृष्ण के पास इनके उत्तर हैं और उन्हें भगवद्गीता में यहां प्रस्तुत किया गया है।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि सभी जीवित प्राणी ब्रह्मन हैं - परम सत्य की आध्यात्मिक ऊर्जा का हिस्सा हैं - शाश्वत, वैयक्तिक, अविनाशी और अपरिवर्तनीय हैं। परन्तु, इस भौतिक दुनिया में हर किसी के शरीर की मृत्यु होती है। कोई छूट नहीं हैं। लेकिन जिनका मन और बुद्धि श्रीकृष्ण पर दृढ़ रहता है, वे इस भौतिक संसार में दोबारा जन्म नहीं लेते, बल्कि कृष्ण की अपनी दिव्य प्रकृति को प्राप्त करते हैं। श्रीकृष्ण स्वभाव से ही सत्-चित्-आनंद हैं, यानी के वे नित्य हैं, ज्ञान में पूर्ण हैं एवं आनंद से भरपूर हैं। मृत्यु के समय कृष्ण का स्मरण करने से व्यक्ति उस दिव्य प्रकृति को प्राप्त कर लेता है और तुरंत भौतिक जगत एवं जन्म और मृत्यु के ग्रहों से परे होकर कृष्ण के धाम पहुंच जाता है। जैसा कि कृष्ण अध्याय १५ में बताएंगे, जो उनके परम धाम को प्राप्त करता है वह इस भौतिक संसार में दोबारा नहीं लौटता।
जब हम संसार की बात करते हैं, तो हम वास्तव में पुनर्जन्म की ही बात करते हैं। यद्यपि, कई समुदायों में पुनर्जन्म एक लोकप्रिय धारणा बनती जा रही है, लेकिन अधिकांश भाग में इसे बहुत गलत समझा जाता है। बहुतों के लिए पुनर्जन्म का अर्थ है, मनुष्य के रूप में ही जन्म लेते रहना, लेकिन यह सत्य नहीं है। मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है। ऐसा नहीं है की यह तेजी से एक के बाद एक आते रहता है। मनुष्य प्रजाति के ऊपर और नीचे सैकड़ों और हजारों अन्य जीवन की प्रजातियां हैं। इस जीवन के अपने कर्मों के अनुसार और मृत्यु के समय की अपनी अंतिम चेतना और मन की स्थिति के अनुसार, अगले जन्म का निर्धारण होता है।
मनुष्य से नीचे की प्रजातियों में, जैसेकि जानवर, जलीय जीव, कीट और पौधों में अत्यधिक अज्ञानता और पीड़ा होती है। मानवीय स्तर के ऊपर दैवी जीव और उनके स्वर्गिक सुख से भरे उच्च ग्रह हैं। तथापि, उच्च हो या निम्न, भौतिक दुनिया में जीव के सभी स्थान अस्थायी ही होते हैं। भौतिक ब्रह्माण्ड में शाश्वत (सार्वकालिक) नरकवास या शाश्वत सुख कहीं नहीं पाया जाता। इस दुनिया में कुछ भी चिरस्थायी नहीं है। केवल कृष्ण का धाम ही आनंद एवं पीड़ा के द्वंद्वों से परे है।
कृष्ण ऊपर के ५ वें श्लोक में कहते हैं, अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् - जो मृत्यु के समय उन्हें याद करता है वह उनके पारलौकिक स्वभाव को प्राप्त करता है। जीवन के अंतिम समय में कृष्ण को याद करना ही सच्ची सिद्धि है, और उन्हें भूलना सबसे बड़ी भूल है। विष्णु-धर्मोत्तर पुराण में कहा गया है -
सा हानिस तन् महाच्छिद्रं स मोहः स च विभ्रमः ।
यन् मुहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवं न चिन्तयेत् ॥
एक क्षण के लिए भी यदि श्रीकृष्ण का स्मरण चूक जाए, तो वही सबसे बड़ा नुकसान, सबसे बड़ा भ्रम और सबसे बड़ी विसंगति है। (विष्णु-धर्मोत्तरा पुराण १.१६)
यद्यपि, इस संसार के अनुभव से हम जानते हैं कि मृत्यु अक्सर दर्द, भ्रम और स्मृति की भ्रांति समते ही होती है। इसलिए, ऐसा लगता है कि मृत्यु के समय श्रीकृष्ण को याद करना कोई आसान काम नहीं होता। मृत्यु किसी भी समय, बिना किसी सूचना के या नींद के दौरान भी तेजी से आ सकती है, अतः इस तरह श्रीकृष्ण का स्मरण करने में बाधा होती है। इस संबंध में कुलशेखर आलवार, अपने मुकुंद-माला-स्तोत्रम् में लिखते हैं -
कृष्ण त्वदीय पद पङ्कज पञ्जरान्तम् ।
अद्यैव विशतु मे मानस राज हंसः ॥
प्राण प्रयाण समये कफ वात पित्तैः ।
कण्ठावरोधनविधौ स्मरणं कुतस्ते ॥
हे कृष्ण, कृपया मुझे शीघ्र ही मृत्यु दें, ताकि मेरे मन का हंस आपके चरण-कमल के तने से घिर जाए। अन्यथा मेरी अंतिम सांस के समय, जब मेरा गला घुट रहा होगा, तब आपका स्मरण करना कैसे संभव होगा? (मुकुंद-माला-स्तोत्रम् ३३)
भक्ति-योगी के लिए श्रीकृष्ण उनके सभी प्रयास, साधना और सेवाओं को ध्यान में रखते हैं। यदि भक्ति-योगी मृत्यु के समय श्रीकृष्ण को याद करने में असमर्थ हो जाये, तभ भी श्रीकृष्ण उन्हें अवश्य याद करेंगे। श्रीकृष्ण कभी भी किसी भी परिस्थिति में भुलते नहीं हैं, अतः वे अपने भक्त को सहजता से मृत्यु के शिकंजे से मुक्त कर देते हैं। वराह पुराण में श्रीकृष्ण स्वयं इसकी पुष्टि करते हैं -
यदि वातादि दोषेण मद्भक्तो मां च न स्मरेत् ।
अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम् ॥
यदि मेरे भक्त मृत्यु के समय शरीर में हो रहे अत्यधिक विघ्न के कारण मुझे याद नहीं कर पाते हैं, तो उस समय मैं अपने भक्त को याद करूँगा और उन्हें आध्यात्मिक जगत ले जाऊंगा।
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