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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम। जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और गांडीवधारी अर्जुन हैं, वहाँ विजय और समृद्धि निश्चित है!
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे। अपना मन मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो; मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, तुम मुझे ही प्राप्त होगे।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते। प्रकृति के गुणों द्वारा सारे कर्म किए जाते हैं, फिर भी अज्ञानी मनुष्य अहंकारवश समझता है कि "मैं कर्ता हूँ"। अहंकार त्यागो!
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं; इन्हें धैर्यपूर्वक सहन करना सीखो।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। जो मुझे सब में देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता। — श्रीकृष्ण
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। निश्चय वाले बुद्धिमान व्यक्ति का लक्ष्य सदा एक होता है, जबकि अस्थिर चित्त वालों के विचार अनंत दिशाओं में भटकते हैं।
क्Claइब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। हे अर्जुन! इस कायरता को प्राप्त मत हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हृदय की दुर्बलता त्यागकर खड़े हो जाओ!
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। चंचल मन अभ्यास और वैराग्य से ही वश में होता है। — श्रीकृष्ण
काम, क्रोध और लोभ — ये तीनों आत्मा का नाश करने वाले नरक के द्वार हैं। इसलिए इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए। — गीता १६.२१
तुम जो कुछ भी करते हो, जो खाते हो, जो तपस्या करते हो, वह सब मुझे अर्पित कर दो। ऐसा करने से तुम कर्म-बंधन से मुक्त हो जाओगे। — गीता ९.२७
जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जो पुरुष अपनी इंद्रियों को विषयों से हटा लेता है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। — गीता २.५८
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन द्वारा अपना उद्धार करे, स्वयं को कभी निराश और दुर्बल न समझे। — श्रीकृष्ण
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संशयग्रस्त व्यक्ति का न इस लोक में सुख है, न परलोक में। संदेह त्यागो! — गीता
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। जिसमें सच्ची श्रद्धा और इंद्रियों पर संयम है, वही परम ज्ञान और सर्वोच्च शांति प्राप्त करता है।
सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय और पराजय को समान समझकर केवल अपने कर्तव्य के लिए तैयार हो जाओ। यही वास्तविक योग है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। दूसरों के श्रेष्ठ मार्ग की नकल करने से बेहतर है कि आप अपने स्वाभाविक कर्तव्य का निष्ठा से पालन करें।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। क्रोध से बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य का पतन निश्चित है।
कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। निष्क्रिय रहकर तो शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं है। उठो और कर्म करो! — श्रीकृष्ण
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है। तुम अमर हो, भय का त्याग करो।
जिसने अपने मन को जीत लिया, उसका मन ही उसका सबसे बड़ा मित्र है। जो मन को न जीत सका, उसका मन ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है। — गीता ६.६
उठो! दुर्बलता का त्याग करो और अपने कर्तव्य के लिए आगे बढ़ो। जो सत्य के मार्ग पर है, उसकी कभी हार नहीं होती।
क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि भ्रष्ट होती है, और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।
परिवर्तन ही इस संसार का नियम है। जिसे तुम आज अंत समझते हो, वही कल एक नई शुरुआत बन जाता है। — गीता
समय से पहले और भाग्य से अधिक कभी किसी को नहीं मिलता। धैर्य रखो, ईश्वर की योजना तुम्हारी योजना से बड़ी है।
जिसने अपने मन को जीत लिया, उसने संसार को जीत लिया। अशांत मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। — गीता
कर्म तुम्हारा अधिकार है, फल पर तुम्हारा कोई नियंत्रण नहीं। चिंता छोड़कर सिर्फ अपने कर्तव्य पर ध्यान दो। — श्रीकृष्ण